शोभना शर्मा। सुंदरबन बैठक के बाद अरावली पर्वतमाला को लेकर देशभर में चल रही चर्चाओं और कथित भ्रम पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री तथा अलवर से लोकसभा सांसद भूपेंद्र यादव ने पूरी स्थिति स्पष्ट कर दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह की कोई छूट नहीं दी गई है और न ही भविष्य में दी जाएगी। सरकार का रुख पूरी तरह से स्पष्ट है कि अरावली पर्वतमाला का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता है।
भूपेंद्र यादव ने बताया कि अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और यह चार राज्यों—दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात—में फैली हुई है। इसका विस्तार कुल 39 जिलों में है, जिससे यह केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन का आधार भी बनती है।
1985 से चल रही है कानूनी लड़ाई
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अरावली को लेकर कानूनी प्रक्रिया कोई नई नहीं है। वर्ष 1985 से इस पर्वतमाला के संरक्षण और खनन पर नियंत्रण को लेकर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित रही हैं। इन याचिकाओं का मूल उद्देश्य यही रहा है कि अरावली क्षेत्र में खनन को लेकर सख्त और एक समान नियम लागू किए जाएं, ताकि पर्यावरण को हो रहे नुकसान को रोका जा सके। सरकार ने हमेशा इन उद्देश्यों का समर्थन किया है।
उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने चारों संबंधित राज्यों को निर्देश दिए हैं कि अरावली की एक समान और वैज्ञानिक परिभाषा तय की जाए। अलग-अलग राज्यों द्वारा अलग-अलग व्याख्याओं के कारण नियमों के उल्लंघन की आशंका बनी रहती थी, जिसे खत्म करना जरूरी था।
100 मीटर सुरक्षा क्षेत्र को लेकर फैले भ्रम पर सफाई
भूपेंद्र यादव ने 100 मीटर के सुरक्षा क्षेत्र को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि कुछ लोग यह गलत प्रचार कर रहे हैं कि 100 मीटर की सीमा का अर्थ पहाड़ी के ऊपर से नीचे तक खुदाई की अनुमति है। उन्होंने इसे पूरी तरह से गलत और भ्रामक बताया।
मंत्री के अनुसार, 100 मीटर की सुरक्षा सीमा पहाड़ी के बॉटम यानी जिस स्थान तक पहाड़ी का आधार फैला होता है, वहां से मानी जाती है। इसका मतलब यह है कि पहाड़ी के नीचे से 100 मीटर तक का पूरा इलाका संरक्षित क्षेत्र रहेगा और वहां किसी भी प्रकार की खुदाई या निर्माण गतिविधि की अनुमति नहीं होगी।
पहाड़ियों के बीच की जमीन भी संरक्षण में
भूपेंद्र यादव ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि दो अरावली पहाड़ियों के बीच की दूरी केवल 500 मीटर है, तो उनके बीच की पूरी जमीन भी अरावली रेंज का हिस्सा मानी जाएगी। इसका सीधा अर्थ है कि संरक्षण केवल पहाड़ियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उनके बीच की भूमि भी इसके दायरे में आएगी।
इस वैज्ञानिक परिभाषा के लागू होने के बाद अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र अब संरक्षित क्षेत्र में शामिल हो चुका है। यह पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
किसी भी तरह की गतिविधि की अनुमति नहीं
केंद्रीय मंत्री ने दो टूक कहा कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार की खुदाई या अन्य गतिविधि की अनुमति नहीं होगी। खासतौर पर दिल्ली के अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक है। उन्होंने बताया कि सरकार पिछले दो वर्षों से “ग्रीन अरावली” पहल पर काम कर रही है, जिसका उद्देश्य अरावली क्षेत्र में हरित आवरण बढ़ाना और जैव विविधता को संरक्षित करना है।
विकास नहीं, संतुलन सरकार का लक्ष्य
भूपेंद्र यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य विकास को रोकना नहीं है, बल्कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना है। उन्होंने कहा कि अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि यह प्राकृतिक विरासत, पर्यावरणीय संतुलन और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का आधार है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और वैज्ञानिक मानकों के आधार पर तय की गई यह परिभाषा अब अरावली को लेकर फैले सभी भ्रम को समाप्त करती है। इससे न केवल अवैध खनन पर प्रभावी रोक लगेगी, बल्कि अरावली को नुकसान पहुंचाने वाली अन्य गतिविधियों पर भी सख्ती से नियंत्रण किया जा सकेगा।
अरावली संरक्षण की दिशा में निर्णायक कदम
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री के इस बयान के बाद यह साफ हो गया है कि अरावली को लेकर किसी भी तरह की ढील नहीं दी जाएगी। सरकार, न्यायपालिका और पर्यावरण विशेषज्ञों के संयुक्त प्रयास से अरावली पर्वतमाला को संरक्षित रखने की दिशा में एक मजबूत और स्पष्ट नीति लागू की जा चुकी है, जो भविष्य में पर्यावरण संरक्षण के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है।


