शोभना शर्मा। अगर आप अपनी मेहनत की कमाई को शॉपिंग मॉल की किसी दुकान में निवेश करने की योजना बना रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए चेतावनी है। अक्सर आकर्षक ब्रॉशर, बड़े-बड़े वादे और मॉल की चमक-दमक निवेशकों को लुभा लेती है, लेकिन कुछ ही वर्षों में कई मॉल वीरान नजर आने लगते हैं। रियल एस्टेट कंसल्टिंग फर्म नाइट फ्रैंक इंडिया की ताजा रिपोर्ट ‘थिंक इंडिया थिंक रिटेल 2025’ ने इस खतरे की ओर गंभीर संकेत दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जिन मॉल्स में दुकानों को अलग-अलग निवेशकों को बेच दिया गया है, उनके फेल होने और घोस्ट मॉल बनने की आशंका सबसे अधिक होती है। ऐसे मॉल्स को स्ट्रेटा ओनरशिप मॉडल के तहत विकसित किया जाता है।
क्या है स्ट्रेटा ओनरशिप मॉडल
रिपोर्ट के मुताबिक, स्ट्रेटा ओनरशिप मॉडल में डेवलपर मॉल के निर्माण के शुरुआती चरण में ही फंड जुटाने के लिए अलग-अलग दुकानों को अलग-अलग निवेशकों को बेच देता है। इसका मतलब यह होता है कि पूरा मॉल किसी एक मालिक के पास नहीं रहता, बल्कि सैकड़ों छोटे-छोटे मालिक बन जाते हैं। मॉल शुरू होने के बाद यही मॉडल उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है, क्योंकि पूरे परिसर की देखरेख और दीर्घकालिक रणनीति तय करने वाला कोई एक जिम्मेदार प्रबंधन नहीं होता।
क्यों फेल हो जाते हैं ऐसे मॉल
स्ट्रेटा ओनरशिप वाले मॉल्स में हर दुकान का मालिक अपनी मर्जी से किसी को भी किराये पर दुकान दे सकता है। इससे मॉल में ब्रांड्स का संतुलित मिश्रण नहीं बन पाता। कहीं कपड़ों की अधिक दुकानें हो जाती हैं, तो कहीं जरूरत के एंकर स्टोर या फूड ब्रांड्स की कमी रह जाती है। नतीजतन, मॉल एक संगठित शॉपिंग डेस्टिनेशन बनने के बजाय दुकानों का बिखरा हुआ समूह बनकर रह जाता है।
नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि ऐसे मॉल्स में सेंट्रलाइज्ड मार्केटिंग और प्रमोशन की भी भारी कमी होती है। कोई भी संस्था या प्रबंधन मॉल को एक ब्रांड के रूप में प्रमोट नहीं करता, जिससे ग्राहक आकर्षित नहीं हो पाते। धीरे-धीरे फुटफॉल कम होने लगता है, दुकानें खाली होने लगती हैं और मॉल एक घोस्ट शॉपिंग सेंटर में तब्दील हो जाता है।
डिजाइन और लेआउट भी बड़ी वजह
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि स्ट्रेटा मॉडल के तहत बने कई मॉल्स सही तरीके से प्लान नहीं किए जाते। छोटे निवेशकों को ज्यादा से ज्यादा दुकानें बेचने के चक्कर में मॉल का डिजाइन किसी पुराने बाजार जैसा बन जाता है। खराब लेआउट के कारण कई दुकानें छिपे हुए कोनों में चली जाती हैं, जहां ग्राहकों की पहुंच नहीं होती। बिक्री न होने से दुकानदार दुकान खाली कर देते हैं और मॉल की हालत और खराब हो जाती है।
भारत में बढ़ते घोस्ट मॉल
नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 29 प्रमुख शहरों में करीब 1.55 करोड़ वर्ग फीट रिटेल स्पेस घोस्ट मॉल के रूप में पड़ा हुआ है। यह आंकड़ा बताता है कि शॉपिंग मॉल में निवेश जितना आकर्षक दिखता है, उतना सुरक्षित नहीं है, खासकर तब जब मॉल स्ट्रेटा ओनरशिप मॉडल पर आधारित हो।
क्या है समाधान
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन मॉल्स को पूरी तरह खत्म मान लेना सही नहीं होगा। अगर स्ट्रेटा ओनरशिप वाले मॉल्स के मालिक एकजुट होकर किसी प्रोफेशनल मैनेजमेंट कंपनी को जिम्मेदारी सौंप दें, तो स्थिति सुधर सकती है। इसके अलावा, ऐसे मॉल्स के उपयोग को बदला भी जा सकता है। इन्हें को-वर्किंग स्पेस, अस्पताल, एजुकेशन सेंटर या एंटरटेनमेंट हब में बदला जाए, तो ये दोबारा उपयोगी बन सकते हैं।
रिपोर्ट का आकलन है कि यदि इन घोस्ट मॉल्स को सही तरीके से पुनर्जीवित किया जाए, तो सालाना करीब 357 करोड़ रुपये तक का किराया उत्पन्न किया जा सकता है। कुल मिलाकर, शॉपिंग मॉल में निवेश करने से पहले निवेशकों को केवल रिटर्न के वादों पर नहीं, बल्कि ओनरशिप मॉडल, प्रबंधन व्यवस्था और दीर्घकालिक योजना पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।


