शोभना शर्मा। इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने के लिए ITR-1 फॉर्म का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उनकी आय सैलरी या पेंशन तक ही सीमित होती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में लोगों का रुझान तेजी से शेयर बाजार की ओर बढ़ा है। ऐसे में अब केवल सैलरी से होने वाली कमाई ही नहीं, बल्कि शेयर बेचकर होने वाले कैपिटल गेन पर भी टैक्स फाइल करना जरूरी हो गया है। यही वजह है कि लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल आता है कि आखिर उन्हें कौन सा आईटीआर फॉर्म भरना चाहिए।
अगर कोई व्यक्ति नौकरी करता है और साथ ही शेयर बाजार में निवेश करता है, तो उसके लिए टैक्स फाइलिंग की प्रक्रिया थोड़ी अलग हो जाती है। क्योंकि सिर्फ सैलरी इनकम वाले के लिए ITR-1 उपयुक्त होता है, लेकिन शेयर बाजार से होने वाली कमाई यानी कैपिटल गेन के आधार पर ITR-2 भी जरूरी हो सकता है।
ITR-1 कब भरना चाहिए?
आईटीआर-1 को सबसे आसान और सीधा फॉर्म माना जाता है। यह खास तौर पर नौकरीपेशा लोगों के लिए बनाया गया है। अगर किसी व्यक्ति की आय केवल सैलरी, पेंशन या बैंक से मिलने वाले ब्याज तक ही सीमित है, तो उसे ITR-1 फॉर्म ही भरना चाहिए। इसके अलावा यदि आपके पास सिर्फ एक ही घर से किराये की आय हो, तो वह भी इसी फॉर्म में दिखाई जा सकती है।
शेयर बाजार से जुड़ी आय के मामले में पहले तक नियम यह था कि जैसे ही कैपिटल गेन होता है, ITR-2 भरना पड़ता था। लेकिन इस बार से नियमों में बदलाव कर दिया गया है। नए नियम के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को शेयर बाजार से 1.25 लाख रुपये तक का कैपिटल गेन हुआ है, तो उसे केवल ITR-1 भरना होगा। यानी अब 1.25 लाख रुपये तक की कमाई होने पर अलग से ITR-2 दाखिल करने की जरूरत नहीं है। सरकार ने इस सीमा तक के कैपिटल गेन को टैक्स से छूट प्रदान की है।
ITR-2 कब भरना जरूरी हो जाता है?
अब मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने शेयर बाजार में निवेश किया और उसे वहां से 1.25 लाख रुपये से ज्यादा का कैपिटल गेन मिला। इस स्थिति में ITR-1 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसे मामले में ITR-2 भरना अनिवार्य हो जाता है।
ITR-2 एक विस्तृत फॉर्म है, जिसमें न केवल सैलरी इनकम बल्कि कैपिटल गेन, रेंटल इनकम और अन्य सोर्स से हुई कमाई को भी आसानी से शामिल किया जा सकता है। इसका फायदा यह है कि टैक्स फाइलिंग एक ही फॉर्म में पूरी हो जाती है और अलग-अलग फॉर्म भरने की जरूरत नहीं रहती। हालांकि यह फॉर्म ITR-1 की तुलना में थोड़ा जटिल है, लेकिन शेयर बाजार में सक्रिय निवेशकों के लिए यही सही विकल्प है।
ITR-1 और ITR-2 में फर्क
अगर आधारभूत रूप से दोनों फॉर्म की तुलना करें तो ITR-1 साधारण आय वालों के लिए है, जबकि ITR-2 जटिल आय स्रोतों को शामिल करता है। ITR-1 केवल सैलरी, पेंशन, ब्याज और एक मकान से हुई कमाई तक सीमित रहता है। वहीं ITR-2 में सैलरी और ब्याज के साथ-साथ शेयर बाजार से होने वाला कैपिटल गेन भी शामिल किया जा सकता है।
कैपिटल गेन की सीमा भी दोनों फॉर्म को अलग करती है। यदि कैपिटल गेन 1.25 लाख रुपये तक है तो ITR-1 मान्य है, लेकिन जैसे ही यह आय इस सीमा से ऊपर जाती है, ITR-2 अनिवार्य हो जाता है।
गलत फॉर्म भरने से हो सकती है परेशानी
कई बार लोग जानकारी के अभाव में गलत आईटीआर फॉर्म भर देते हैं। मान लीजिए किसी व्यक्ति का कैपिटल गेन 1.25 लाख रुपये से ज्यादा है और फिर भी उसने ITR-1 भर दिया। ऐसे में इनकम टैक्स विभाग उसका रिटर्न खारिज कर सकता है। इतना ही नहीं, टैक्स नोटिस भी आ सकता है और सही फॉर्म से दोबारा फाइल करने में देर हुई तो पेनल्टी भी लग सकती है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि शुरू से ही सही आईटीआर फॉर्म चुना जाए।
आसान उदाहरण से समझें
मान लीजिए आप एक कंपनी में नौकरी करते हैं और साल भर में आपकी सैलरी से इनकम 8 लाख रुपये है। इसके साथ ही आपने शेयर बाजार में निवेश किया और वहां से आपको 90 हजार रुपये का कैपिटल गेन मिला। इस स्थिति में आपको केवल ITR-1 भरना है।
अब अगर यही कैपिटल गेन बढ़कर 2 लाख रुपये हो जाए, तो आपको ITR-2 फॉर्म भरना अनिवार्य हो जाएगा। इसमें आप अपनी सैलरी इनकम और शेयर बाजार से हुई कमाई दोनों को जोड़कर दाखिल कर सकते हैं।


