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अशोक गहलोत ने उठाए चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल

अशोक गहलोत ने उठाए चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल

शोभना शर्मा।  राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने एक बार फिर चुनाव आयोग और भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर दो अलग-अलग मुद्दों को लेकर अपनी गहरी नाराजगी जाहिर की। एक ओर उन्होंने चुनाव आयोग पर विपक्ष के खिलाफ पक्षपाती रवैया अपनाने का गंभीर आरोप लगाया, तो दूसरी ओर राजस्थान सरकार को बच्चों के शिक्षा अधिकार (RTE) के मामले में लापरवाही बरतने पर कठोर शब्दों में घेरा। गहलोत का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब देश में विपक्ष लगातार चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है। खासकर राहुल गांधी और अखिलेश यादव की ओर से सामने लाए गए तथ्यों के बाद यह विवाद और गहराता जा रहा है।

चुनाव आयोग पर गहलोत का तीखा हमला

अशोक गहलोत ने लिखा कि राहुल गांधी, जो एक संवैधानिक पद पर हैं, ने पूरी जिम्मेदारी से सबूतों के साथ चुनाव आयोग पर वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के आरोप लगाए। लेकिन, इन गंभीर आरोपों की जांच करने के बजाय आयोग ने उनसे शपथ पत्र मांगा। यह कदम आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। गहलोत ने भाजपा नेता अनुराग ठाकुर का उदाहरण भी दिया। उन्होंने बताया कि ठाकुर ने भी कुछ सीटों पर वोटर लिस्ट में गड़बड़ी की बात कही थी, लेकिन आयोग ने उनसे कोई शपथ पत्र नहीं मांगा। यह भेदभावपूर्ण रवैया चुनाव आयोग की छवि को धूमिल करता है और उसकी निष्पक्षता को संदेह के घेरे में लाता है।

अखिलेश यादव के सबूतों का हवाला

गहलोत ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का उदाहरण पेश करते हुए कहा कि अखिलेश यादव ने 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान चुनाव आयोग को दी गईं शिकायतों का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिया है। गहलोत ने कहा कि अखिलेश यादव ने 18,000 से अधिक शिकायतें शपथ पत्रों के साथ चुनाव आयोग को दी थीं। उनकी रिसीविंग भी मौजूद है। इसके बावजूद आयोग ने कभी इन शिकायतों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अब जब विपक्ष सवाल पूछ रहा है तो आयोग यह कह रहा है कि उसे कोई शिकायत मिली ही नहीं। यह रवैया न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है बल्कि इससे यह भी साफ झलकता है कि चुनाव आयोग विपक्षी दलों की आवाज को दबाने का प्रयास कर रहा है। गहलोत ने आरोप लगाया कि यह कहीं न कहीं भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत को उजागर करता है।

RTE में बच्चों की दुर्दशा पर सरकार को घेरा

चुनाव आयोग के मुद्दे पर हमला करने के बाद गहलोत ने शिक्षा के अधिकार (Right to Education – RTE) के मसले पर राजस्थान सरकार की घोर लापरवाही को सामने रखा। उन्होंने लिखा कि आज कई अभिभावक उनके पास आए और उन्होंने RTE की लॉटरी में चयनित होने के बावजूद अपने बच्चों को स्कूलों में एडमिशन न मिलने की समस्या साझा की। उन्होंने कहा कि यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अन्यायपूर्ण है। बच्चों की शिक्षा एक मूलभूत अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

गहलोत ने सवाल उठाया कि अगर चयनित बच्चों को भी स्कूलों में दाखिला नहीं मिलेगा तो RTE लॉटरी का क्या महत्व रह जाएगा? उन्होंने याद दिलाया कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में RTE कानून बनाया गया था ताकि गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को भी निजी स्कूलों में पढ़ने का अवसर मिल सके। कांग्रेस सरकार के समय इस कानून को लागू कर हजारों बच्चों का भविष्य संवारा गया था, लेकिन आज सरकार की लापरवाही के कारण वही बच्चे दर-दर भटक रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग और राज्य सरकार को हर हाल में चयनित बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना चाहिए।

गहलोत का दोहरा वार: सत्ता और संस्थाओं पर सवाल

अशोक गहलोत के इन बयानों से यह स्पष्ट होता है कि वह एक साथ केंद्र और राज्य, दोनों स्तर की सत्ता को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। चुनाव आयोग पर भाजपा के साथ सांठगांठ का आरोप लगाकर उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को सवालों के घेरे में रखा है। वहीं, राज्य सरकार पर आरटीई जैसे संवेदनशील मुद्दे को लेकर हमला करके उन्होंने आम जनता के बीच सरकार की छवि कमजोर करने की कोशिश की है। गहलोत का यह दोहरा वार विपक्षी राजनीति के लिए एक अहम रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। क्योंकि एक ओर वे केंद्र को निशाने पर ले रहे हैं, तो दूसरी ओर राजस्थान में भी सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं।

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