शोभना शर्मा । राजस्थान में निकाय और पंचायत चुनावों को लेकर चल रहे असमंजस के बीच सोमवार को राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने साफ कर दिया कि राज्य सरकार परिसीमन का हवाला देकर निकाय चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए टाल नहीं सकती है। साथ ही, कोर्ट ने उन आदेशों को भी निरस्त कर दिया है, जिनके तहत प्रदेश की 17 पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए गए थे। इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक ढांचे पर बड़ा असर पड़ना तय है।
सिंगल बेंच का सख्त रुख
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की सिंगल बेंच ने भिनाय ग्राम पंचायत की प्रशासक डॉ. अर्चना सुराणा और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट लक्ष्मीकांत शर्मा मालपुरा ने बहस की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार के रुख को अस्वीकार करते हुए कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया समय पर पूरी होनी चाहिए थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार का दायित्व है कि वह परिसीमन निकायों के भंग होने से पहले या अधिकतम छह महीने के भीतर पूरा करे। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यही वजह है कि निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद अब तक चुनाव नहीं हो पाए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन के लिए हानिकारक है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि निकायों का कार्यकाल खत्म होने के छह महीने के भीतर चुनाव होना संवैधानिक बाध्यता है। अगर चुनाव नहीं होंगे तो स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक कमी आ जाएगी और जनता की समस्याओं का समाधान बाधित होगा। कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग और मुख्य सचिव को आदेशों की प्रति भेजकर जल्द से जल्द कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है।
सरकार की दलील और चुनावी प्लान
उधर, सरकार का पक्ष है कि परिसीमन और प्रशासनिक संरचना में सुधार की वजह से चुनाव में देरी हुई है। हाल ही में यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने बयान दिया था कि प्रदेश में दिसंबर 2025 तक निकाय चुनाव करवाए जाएंगे। मंत्री ने जानकारी दी थी कि नगर निकायों का पुनर्सीमांकन कर नोटिफिकेशन जारी किया जा चुका है और जल्द ही वार्डों का भी पुनर्सीमांकन पूरा होगा। उन्होंने बताया था कि वर्तमान में राजस्थान में 312 नगर निकाय हैं, लेकिन जयपुर, जोधपुर और कोटा में दो-दो नगर निगम होने के कारण इन्हें मिलाकर निकायों की संख्या घटाकर 309 कर दी जाएगी। सरकार का तर्क है कि इस प्रक्रिया को पूरा करने के बाद ही चुनाव कराए जा सकते हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक असर
हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य की राजनीति में नया मोड़ लेकर आया है। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि सरकार जानबूझकर परिसीमन के नाम पर चुनाव टाल रही है ताकि राजनीतिक फायदा उठाया जा सके। अब कोर्ट के आदेश के बाद सरकार पर चुनाव जल्दी कराने का दबाव और बढ़ जाएगा। स्थानीय निकाय चुनाव केवल प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा नहीं होते, बल्कि ये जनता और सरकार के बीच सीधा जुड़ाव कायम करते हैं। अगर समय पर चुनाव नहीं होते तो स्थानीय स्तर पर न केवल लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर होता है बल्कि जनता की समस्याओं के समाधान की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।


