मनीषा शर्मा । राजस्थान हाई कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने “भंगी, नीच, भिखारी, और मंगनी” जैसे शब्दों को अब जाति सूचक की श्रेणी से बाहर कर दिया है। यह फैसला जस्टिस वीरेंद्र कुमार की बेंच ने सुनाया, जिसमें कहा गया कि इन शब्दों का उपयोग अपमानजनक इरादे से नहीं किया गया था।
कैसे पहुंचा मामला हाई कोर्ट?
यह मामला अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान शुरू हुआ, जब चार याचिकाकर्ताओं और सरकारी लोकसेवकों के बीच विवाद हो गया। इस दौरान कथित रूप से इन शब्दों का उपयोग किया गया, जिसके बाद एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया।
आरोपी पक्ष ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इन शब्दों को जाति आधारित नहीं मानने की दलील दी। वकील के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने इन शब्दों को जाति सूचक की श्रेणी से हटाने का निर्णय लिया।
कोर्ट का निर्णय
जस्टिस वीरेंद्र कुमार की बेंच ने यह माना कि “भंगी, नीच, भिखारी, और मंगनी” शब्द जाति आधारित अपमान नहीं दर्शाते। इन शब्दों के उपयोग का उद्देश्य जातिगत अपमान नहीं था।
कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष:
- इन शब्दों का उपयोग जातिगत अपमान के इरादे से नहीं किया गया।
- याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि आरोपी सरकारी कर्मचारियों की जाति से परिचित थे।
- एससी-एसटी एक्ट के तहत इन शब्दों का उपयोग अपराध नहीं माना जा सकता।
वकीलों के तर्क:
इस मामले में आरोपी के वकील ने दलील दी कि:
- इन शब्दों का उपयोग अपमान करने के इरादे से नहीं, बल्कि भावनाओं में बहकर किया गया।
- ये शब्द जातिगत टिप्पणी के उद्देश्य से नहीं बोले गए थे।
- याचिकाकर्ता ने यह साबित नहीं किया कि आरोपी उनकी जाति से परिचित थे।
क्या है SC-ST एक्ट?
एससी-एसटी एक्ट, 1989 में अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए लागू किया गया था। इस एक्ट के तहत जातिगत अपमान और भेदभाव पर कठोर सजा का प्रावधान है।
फैसले के प्रभाव:
- कानूनी बदलाव:
इस फैसले से एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने में मदद मिलेगी। - सामाजिक प्रभाव:
जातिगत भेदभाव के मामलों में स्पष्टता आएगी और वास्तविक मामलों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। - प्रभावित शब्द:
“भंगी, नीच, भिखारी, मंगनी” जैसे शब्द अब एक्ट के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आएंगे।
सवाल उठे, फैसले का समर्थन भी मिला
इस फैसले को लेकर समाज में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।
- समर्थन:
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायिक निष्पक्षता का उदाहरण है। - विरोध:
सामाजिक संगठनों ने आशंका जताई है कि इससे जातिगत अपमान के मामलों को अनदेखा किया जा सकता है।


