शोभना शर्मा। राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में अन्नकूट उत्सव की धूम मची हुई है। यह पर्व दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता है और भगवान को छप्पन भोग की झांकी सजाई जाती है। जयपुर, बूंदी, नाथद्वारा और डूंगरपुर सहित कई स्थानों पर विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। इस दिन गोवर्धन पूजा भी होती है, जिसमें ग्रामीण अपने घरों के आंगन में गोबर से गोवर्धन भगवान की प्रतिमा बनाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। इसके साथ ही, अन्नकूट के अवसर पर अनेक पकवान बनाकर भगवान को भोग अर्पित किया जाता है और फिर प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है।
जयपुर में गोशालाओं में दान-पुण्य और अन्नकूट भोग
जयपुर और उसके आसपास के इलाकों में अन्नकूट उत्सव के दिन गोशालाओं में दान-पुण्य करने की परंपरा है। मंदिरों में प्रसादी तैयार की जाती है जिसमें चावल, मूंग, बाजरा, मिक्स सब्जी और कढ़ी शामिल हैं। भगवान को भोग लगाने के बाद इसे भक्तों में बांटा जाता है। इस दिन लोग मंदिरों में आकर प्रसाद ग्रहण करते हैं और दान-पुण्य करते हैं। गोवर्धन पूजा में आंगन में गोबर से गोवर्धन भगवान की प्रतिमा बनाकर शाम को उनकी पूजा की जाती है।
बूंदी के नैनवां में 44 साल पुराना पटाखा युद्ध
बूंदी के नैनवां कस्बे में शुक्रवार की रात पटाखा युद्ध का आयोजन किया गया। यह आयोजन दीपावली के दूसरे दिन हर साल होता है और इसमें दो दल बनते हैं, जो एक-दूसरे पर जलते पटाखे फेंकते हैं। युवाओं के इस खेल में पूरा कस्बा आतिशी धमाकों से गूंज उठता है और लोग इसे देखने के लिए घरों की छतों पर चढ़ जाते हैं। इस परंपरा के बारे में बताया जाता है कि यह 44 साल पुरानी है। पहले किसान बैलों की पूजा करते थे और पटाखे चलाते थे, जिससे बैल बिदक जाते थे। धीरे-धीरे खेती में बैलों का इस्तेमाल कम हुआ, लेकिन यह परंपरा बनी रही और अब लोग पटाखा युद्ध के रूप में इसे निभाते हैं।
इस खेल के लिए दीपावली से कुछ दिन पहले युवाओं की दो टोलियां बन जाती हैं और दोनों पक्ष अपने क्षेत्र तय कर लेते हैं। इस दिन कस्बे के बाजार बंद हो जाते हैं और गलियों में यह युद्ध चलता है। पटाखा युद्ध के दौरान कभी-कभी चोट लगने के बावजूद कोई थाने में शिकायत दर्ज नहीं कराता बल्कि अगली सुबह हालचाल पूछने घर जाता है और मिठाई खाकर आता है। इस परंपरा को निभाने वाले इसे आनंद और उत्साह का प्रतीक मानते हैं।
नाथद्वारा में अन्नकूट की लूट
राजसमंद के नाथद्वारा में श्रीनाथजी मंदिर में अन्नकूट उत्सव पर विशेष आयोजन होता है। रात 11 बजे मंदिर के पट खुलते हैं और भील आदिवासी बड़ी पोटलियों में अन्नकूट प्रसाद बांधकर लूटते हैं। यह परंपरा भी सदियों पुरानी है। अन्नकूट की झांकी में चावल का पहाड़ बनाकर भगवान श्रीजी को भोग लगाया जाता है, जिसे बाद में श्रद्धालु लूटकर अपने घर ले जाते हैं। दिन भर मंदिर में गोवर्धन पूजा के तहत कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और गोशाला की गायों को भी मोरपंख से सजाया जाता है। इस लूट की परंपरा में भील आदिवासी अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं और इसे बेहद उत्साह के साथ मनाते हैं।
डूंगरपुर में गायों की रेस
डूंगरपुर के बिछीवाड़ा के छापी गांव में शनिवार सुबह गायों की दौड़ का आयोजन किया गया। यहां लगभग 200 गायों ने पंचायत समिति भवन के पीछे मैदान में दौड़ लगाई। पशुपालक अपनी गायों को मोरपंख, तोरण और रंग-बिरंगी कपड़ों से सजाकर इस दौड़ में शामिल करते हैं। यह परंपरा लगभग 200 साल पुरानी है। ग्रामीण मानते हैं कि सफेद रंग की गाय अगर दौड़ में जीतती है तो अच्छी वर्षा होती है और फसल उत्पादन में वृद्धि होती है। इस साल भी सफेद रंग की गाय ने जीत दर्ज की जिससे गांव में खुशी की लहर दौड़ गई।
भीलवाड़ा में अन्नकूट पर गोवंश की दीपावली
भीलवाड़ा में अन्नकूट को गोवंश की दीपावली के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बाजारों में गाय-बैलों को सजाने के लिए रंग-बिरंगे आइटम खरीदे जाते हैं। पशुपालक अपनी गाय-बैलों को अच्छे से सजा कर मंदिरों में ले जाते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। यहां गोवंश के प्रति सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।
राजस्थान के विभिन्न जिलों में मनाए जाने वाले ये विविध और अनोखे आयोजन इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का परिचय देते हैं। अन्नकूट उत्सव के साथ जुड़ी ये परंपराएँ लोगों में भाईचारे, आनंद और धार्मिक भावना को सुदृढ़ करती हैं।


