आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। कॉल, मैसेज, सोशल मीडिया, बैंकिंग और शॉपिंग—सब कुछ इसी डिवाइस से जुड़ा है। लेकिन बहुत कम यूजर्स इस बात पर ध्यान देते हैं कि जब वे रात में सो रहे होते हैं और फोन स्टैंडबाय मोड पर होता है, तब भी फोन पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होता। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, स्टैंडबाय मोड में भी स्मार्टफोन लगातार डेटा सेंड और रिसीव करता रहता है। इसमें कुछ डेटा जरूरी होता है, जैसे सिस्टम अपडेट, ई-मेल सिंक, मैसेज नोटिफिकेशन और सिक्योरिटी अलर्ट। लेकिन इसके अलावा भी एक ऐसा डेटा ट्रांसफर होता है, जो यूजर की जानकारी और सहमति के बिना उसकी प्राइवेसी पर असर डाल सकता है।
कौन-सा डेटा बन सकता है चिंता की वजह
साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञों का कहना है कि स्मार्टफोन दिन-रात कई तरह का डेटा ट्रांसमिट करता है। इसमें वह डेटा भी शामिल होता है, जिसका इस्तेमाल यूजर ट्रैकिंग और एडवरटाइजिंग के लिए किया जाता है। इस डेटा में मुख्य रूप से शामिल हो सकते हैं:
आपकी लोकेशन से जुड़ी जानकारी
डिवाइस से संबंधित तकनीकी डिटेल
ऐप यूसेज पैटर्न
ब्राउज़िंग बिहेवियर
सर्च हिस्ट्री से जुड़ा मेटाडेटा
भले ही आप रात में फोन का इस्तेमाल नहीं कर रहे हों, लेकिन बैकग्राउंड में चल रही ऐप्स और सर्विसेज यह जानकारी सर्वर तक भेजती रहती हैं। इससे यूजर प्रोफाइलिंग होती है, जिसके आधार पर टारगेटेड विज्ञापन दिखाए जाते हैं।
‘सुनी-सुनी बातें’ और अगले दिन दिखने वाले विज्ञापन
पिछले कुछ सालों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां यूजर्स ने आरोप लगाए कि उन्होंने किसी प्रोडक्ट के बारे में सिर्फ बात की और अगले ही दिन उससे जुड़े विज्ञापन उनके फोन पर दिखने लगे। हालांकि कंपनियां माइक्रोफोन से जासूसी के आरोपों से इनकार करती रही हैं, लेकिन यह साफ है कि ऐप्स द्वारा कलेक्ट किया गया बिहेवियरल डेटा और ट्रैकिंग इंफॉर्मेशन एडवरटाइजिंग नेटवर्क तक पहुंचता है। यही वजह है कि कई बार यूजर को ऐसा महसूस होता है कि फोन उसकी निजी जिंदगी में झांक रहा है।
बड़ी कंपनियों पर भी लगे आरोप
पिछले साल कई बड़ी टेक कंपनियों पर एंड्रॉयड यूजर्स की ट्रैकिंग और डेटा कलेक्शन को लेकर सवाल उठे थे। आरोप यह थे कि यूजर की स्पष्ट सहमति के बिना भी कुछ ऐप्स बैकग्राउंड में डेटा ट्रांसफर कर रही थीं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि आम यूजर को इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती और वह फोन स्लो होने या बैटरी जल्दी खत्म होने को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देता है, जबकि इसके पीछे लगातार चल रही बैकग्राउंड एक्टिविटीज हो सकती हैं।
बैटरी और परफॉर्मेंस पर भी पड़ता है असर
रात में फोन ऑन रखने और लगातार बैकग्राउंड डेटा ट्रांसफर का असर सिर्फ प्राइवेसी तक सीमित नहीं रहता।
बैटरी तेजी से डिस्चार्ज होती है
फोन की परफॉर्मेंस धीरे-धीरे स्लो हो सकती है
डेटा कंजम्पशन अनावश्यक रूप से बढ़ सकता है
डिवाइस जरूरत से ज्यादा गर्म हो सकता है
यानी स्टैंडबाय मोड में भी फोन पूरी तरह ‘रेस्ट’ में नहीं होता।
इससे कैसे करें बचाव
साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि कुछ आसान आदतें अपनाकर इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
ऐप परमिशन की समीक्षा करें
अपने फोन में इंस्टॉल ऐप्स की परमिशन जरूर चेक करें। खासकर माइक्रोफोन, कैमरा, लोकेशन और ट्रैकिंग से जुड़ी परमिशन पर ध्यान दें। जो ऐप्स गैरजरूरी परमिशन मांग रही हों, उन्हें हटाना बेहतर है।
अनयूज्ड ऐप्स को अनइंस्टॉल करें
कई ऐप्स ऐसी होती हैं, जो इस्तेमाल न होने पर भी बैकग्राउंड में एक्टिव रहती हैं। ऐसी ऐप्स को फोन से हटाना समझदारी है।
बैकग्राउंड डेटा और रिफ्रेश सीमित करें
एंड्रॉयड और आईफोन दोनों में बैकग्राउंड ऐप रिफ्रेश और डेटा एक्सेस को सीमित या बंद करने का विकल्प मिलता है। इसका इस्तेमाल जरूर करें।
रात में फोन स्विच ऑफ या एयरप्लेन मोड
अगर संभव हो, तो रात में सोते समय फोन स्विच ऑफ कर दें या एयरप्लेन मोड पर डालें। इससे अनावश्यक डेटा ट्रांसफर रुक सकता है। स्मार्टफोन भले ही हमारी सुविधा का सबसे बड़ा साधन बन गया हो, लेकिन इसकी कीमत हमें अपनी प्राइवेसी से चुकानी पड़ सकती है। रात में फोन ऑन रखना एक छोटी-सी आदत लग सकती है, लेकिन इसके पीछे डेटा ट्रैकिंग और प्रोफाइलिंग का एक बड़ा सिस्टम काम कर रहा होता है। थोड़ी-सी सावधानी और सही सेटिंग्स के जरिए न सिर्फ आप अपने फोन की बैटरी और परफॉर्मेंस बचा सकते हैं, बल्कि अपनी डिजिटल प्राइवेसी को भी बेहतर तरीके से सुरक्षित रख सकते हैं।


