शोभना शर्मा। राजस्थान की राजनीति में इन दिनों बारां जिले की अंता विधानसभा सीट सुर्खियों में है। यह उपचुनाव न केवल भजनलाल शर्मा सरकार और विपक्ष की कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है, बल्कि यह मुकाबला एक नई राजनीतिक वास्तविकता को भी उजागर कर रहा है — ‘नारी शक्ति’ अब केवल मंच या समर्थन तक सीमित नहीं रही, बल्कि चुनावी रणभूमि की अग्रिम पंक्ति में उतर चुकी है। अंता में इस बार का चुनाव प्रचार पूरी तरह से महिला ऊर्जा और नेतृत्व से सराबोर दिखाई दे रहा है। भाजपा और कांग्रेस — दोनों दलों ने अपनी-अपनी महिला ब्रिगेड को मैदान में उतारा है, जो गांव-गांव जाकर मतदाताओं को लुभाने में जुटी हैं।
भाजपा की महिला ताकत: वसुंधरा से लेकर मंजू बाघमार तक
भाजपा ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए अपने बड़े चेहरों को मैदान में उतारा है। प्रचार की शुरुआत राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने की। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी मोरपाल सुमन के पक्ष में सभाओं को संबोधित करते हुए कहा कि “भाजपा की सरकार विकास और सुरक्षा की गारंटी है।” राजे ने कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए स्पष्ट किया कि भाजपा के शासन में महिला सम्मान और सुरक्षा सर्वोपरि है।
वहीं, महिला एवं बाल विकास मंत्री मंजू बाघमार ने अपने प्रभावी भाषणों से माहौल को और गर्माया। उन्होंने कहा कि भजनलाल शर्मा सरकार के कार्यकाल में महिला अपराधों में कमी आई है और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई ठोस कदम उठाए गए हैं। बाघमार ने कहा, “राजस्थान में अब महिलाएं सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि नीति निर्धारण में भी बराबर की भागीदार हैं।” इसके अलावा, भरतपुर जिले की कामां विधायक नौक्षम चौधरी ने भी अंता के ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के पक्ष में मोर्चा संभाला। उन्होंने विशेष रूप से अल्पसंख्यक महिलाओं के बीच जाकर भाजपा के लिए समर्थन मांगा। चौधरी ने कहा कि “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा महिलाओं के लिए शुरू की गई योजनाओं से हर वर्ग की महिला को सशक्त बनाया गया है।”
कांग्रेस की महिला ब्रिगेड: मीनाक्षी चंद्रावत और उर्मिला जैन का मोर्चा
कांग्रेस ने भी इस चुनाव में महिला शक्ति को प्रमुख भूमिका में रखा है। खानपुर की पूर्व विधायक मीनाक्षी चंद्रावत प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। वे गांव-गांव जाकर कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद जैन भाया के पक्ष में समर्थन जुटा रही हैं। चंद्रावत ने कहा कि उन्हें जनता से बेहद अच्छा समर्थन मिल रहा है। उन्होंने भावनात्मक अंदाज में कहा — “घायल यहां हर परिंदा है, जो फिर से उड़ा वही जिंदा है।” उन्होंने दावा किया कि “भाया” का नाम इस क्षेत्र में परिवार की तरह जुड़ा हुआ है। जिन घरों में वे जा रही हैं, वहां महिलाएं कहती हैं कि उनके घर की बहुएं भाया द्वारा करवाए गए सामूहिक विवाह सम्मेलन से आई हैं। इस जुड़ाव ने कांग्रेस को महिला वोटरों के बीच गहरी पैठ दी है। वहीं, बारां जिला प्रमुख उर्मिला जैन ने महंगाई और महिलाओं की आर्थिक स्थिति को बड़ा मुद्दा बनाया। उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों में महंगाई इतनी बढ़ गई है कि आम गृहिणी को रसोई चलाने में मुश्किल हो रही है। उन्होंने भाजपा सरकार पर हमला करते हुए कहा कि “महिलाएं आज कह रही हैं कि पहले की योजनाएं बंद होने से उनका जीवन कठिन हुआ है।”
प्रत्याशियों की पत्नियां भी मैदान में
अंता उपचुनाव की सबसे विशेष बात यह है कि इस बार दोनों प्रमुख प्रत्याशियों की पत्नियां भी सक्रिय रूप से प्रचार में उतरी हैं। कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद जैन भाया की पत्नी उर्मिला भाया महिलाओं के बीच जाकर दर-दर जनसमर्थन जुटा रही हैं। वे गांव-ढाणी में जाकर महिलाओं को समझा रही हैं कि “भाया हमेशा जनता के बीच रहे हैं और उन्होंने हर वर्ग के विकास के लिए काम किया है।” दूसरी ओर, भाजपा प्रत्याशी मोरपाल सुमन की पत्नी नटी बाई ने भी चुनावी प्रचार की कमान संभाली है। वे अपनी सखियों के साथ लोकगीतों और भजनों के माध्यम से महिलाओं तक अपनी बात पहुंचा रही हैं। उनका यह पारंपरिक अंदाज ग्रामीण इलाकों में खासा लोकप्रिय हो रहा है।
नारी शक्ति बनी चुनावी केंद्रबिंदु
अंता का यह उपचुनाव इस बात का जीवंत उदाहरण है कि अब महिलाएं राजनीति की निर्णायक भूमिका में हैं। जहां पहले महिला कार्यकर्ता केवल मंच पर उपस्थित रहती थीं, वहीं अब वे जनसभा, घर-घर संपर्क और बूथ स्तर के प्रबंधन तक में अहम भूमिका निभा रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अंता उपचुनाव में महिला मतदाताओं की भूमिका निर्णायक साबित होगी। राजस्थान में लगभग 48 प्रतिशत मतदाता महिलाएं हैं, और इस बार दोनों दल उनके समर्थन के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
महिला नेतृत्व का उभार और भविष्य की दिशा
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का संघर्ष नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में बदलाव का संकेत है। महिला नेताओं की सक्रियता यह दर्शाती है कि आने वाले वर्षों में राजस्थान की राजनीति में महिलाओं का प्रभाव लगातार बढ़ेगा। वसुंधरा राजे और मंजू बाघमार जैसे वरिष्ठ नेताओं से लेकर मीनाक्षी चंद्रावत और उर्मिला भाया जैसी जमीनी महिला नेताओं तक — सभी मिलकर यह संदेश दे रही हैं कि राजनीति अब ‘पुरुष प्रधान क्षेत्र’ नहीं रही।


