भारत में हृदय रोग विशेषज्ञ अब एक नए चिंताजनक रुझान पर गंभीर चर्चा कर रहे हैं। कम उम्र के युवाओं में आर्टरीज समय से पहले सख्त हो रही हैं, जबकि उनकी क्रोनोलॉजिकल उम्र 30–35 वर्ष होती है, लेकिन जांच में उनकी आर्टरीज जैविक रूप से 50–55 वर्ष जैसी दिखाई देती हैं। डॉक्टर इस स्थिति को अर्ली वैस्कुलर एजिंग कहते हैं, जिसमें रक्त वाहिकाएँ वास्तविक उम्र से अधिक तेजी से बूढ़ी होने लगती हैं। यह प्रक्रिया अक्सर चुपचाप आगे बढ़ती है और कई लोगों को इसका पता भी नहीं चलता।
क्रोनोलॉजिकल एज बनाम बायोलॉजिकल एज
कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विवेक कुमार के अनुसार, आज मानव शरीर की उम्र को दो हिस्सों में समझा जाता है—एक वह उम्र जो जन्म प्रमाणपत्र दिखाता है और दूसरी वह जो शरीर के अंगों की स्थिति बताती है। कई बार व्यक्ति युवा दिखता है, लेकिन उसके हृदय और आर्टरीज वास्तविक उम्र से कहीं अधिक बोझ झेल रहे होते हैं।
हेल्दी आर्टरीज सामान्य स्थिति में लचीली होती हैं, जो हृदय की हर धड़कन के साथ फैलती और सिकुड़ती हैं ताकि रक्त प्रवाह सुचारू बना रहे। लेकिन जब इनमें सख्ती और मोटापन बढ़ने लगता है, तो यह संकेत होता है कि आर्टरीज में सूक्ष्म स्तर पर क्षति जमा हो रही है। यह क्षति वर्षों तक बिना किसी लक्षण के बढ़ सकती है, जो आगे चलकर गंभीर हृदय रोगों का कारण बन सकती है।
युवा आर्टरीज क्यों हो रहीं समय से पहले बूढ़ी?
विशेषज्ञ डॉ. मुकेश गोयल बताते हैं कि आधुनिक जीवनशैली इसका सबसे बड़ा कारण है। लंबे समय तक बैठे रहना, उच्च तनाव वाली नौकरियाँ, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन, कम नींद और धूम्रपान जैसे कारक आर्टरीज को तेजी से नुकसान पहुंचा रहे हैं।
भारत में मधुमेह के बढ़ते मामलों ने भी जोखिम को गहरा किया है। ICMR की INDIAB स्टडी में कम उम्र में डायबिटीज और प्रीडायबिटीज के मामलों में वृद्धि की पुष्टि हुई है, जो हृदय रोग का प्रमुख जोखिम कारक है।
इसके अलावा, World Health Organization के अनुसार हृदय रोग आज भी दुनिया में मृत्यु का मुख्य कारण है, और अब यह खतरा केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा। खराब दिनचर्या, असंतुलित आहार और लगातार तनाव का असर युवा पीढ़ी पर तेजी से दिखाई दे रहा है।
इसे कैसे रोका जा सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोग खुद को स्वस्थ मान लेते हैं क्योंकि उन्हें कोई लक्षण अनुभव नहीं होता। आर्टरीज में जमा सख्ती कई वर्षों तक बिना संकेत दिए बढ़ती रहती है, और कई बार पहला संकेत सीधे दिल का दौरा या स्ट्रोक हो सकता है।
फिर भी यह स्थिति बदली जा सकती है। नियमित एरोबिक गतिविधियाँ, संतुलित आहार जिसमें फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज और नट्स शामिल हों, पर्याप्त नींद और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, आर्टरीज की लचक को सुधार सकते हैं। धूम्रपान छोड़ने से कुछ महीनों में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति अपनी बायोलॉजिकल एज को समझे। यह जानना कि शरीर की वास्तविक क्षमता कैसी है, हृदय रोगों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि युवाओं की जीवनशैली में उचित परिवर्तन आएं, तो समय से पहले बूढ़ी होती आर्टरीज की समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है।


