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8 रुपये की थाली में क्या बदला: इंदिरा रसोई बनाम अन्नपूर्णा रसोई की जमीनी हकीकत

8 रुपये की थाली में क्या बदला: इंदिरा रसोई बनाम अन्नपूर्णा रसोई की जमीनी हकीकत

शोभना शर्मा।  राजस्थान में शहरी गरीब, मजदूर और जरूरतमंद वर्ग के लिए सस्ती भोजन योजना बीते कई वर्षों से सामाजिक सुरक्षा का अहम जरिया बनी हुई है। वर्ष 2020 में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने “कोई भूखा न सोए” के उद्देश्य से इंदिरा रसोई योजना की शुरुआत की थी। सत्ता परिवर्तन के बाद भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने इसी योजना को अन्नपूर्णा रसोई के नाम से आगे बढ़ाया। नाम भले ही बदला हो, लेकिन 8 रुपये में भरपेट भोजन का दावा दोनों सरकारों की साझा नीति रहा है। इसके बावजूद, जमीनी हकीकत में भोजन करने वालों का अनुभव अब अलग नजर आने लगा है।

कांग्रेस सरकार की इंदिरा रसोई योजना

अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई इंदिरा रसोई योजना को शहरी गरीबों के लिए बड़ी राहत माना गया। इस योजना के तहत मात्र 8 रुपये में एक थाली भोजन उपलब्ध कराया जाता था। थाली में 250 ग्राम चपाती, 100 ग्राम दाल, 100 ग्राम सब्जी और अचार शामिल होता था। कुल मिलाकर भोजन की मात्रा लगभग 450 ग्राम होती थी।

सरकार प्रति थाली करीब 12 रुपये की सब्सिडी देती थी। राज्यभर में सैकड़ों इंदिरा रसोइयों के जरिए रोजाना एक लाख से अधिक लोगों को भोजन उपलब्ध कराया जाता था। सरकार का लक्ष्य प्रतिदिन करीब 2.30 लाख जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने का था। योजना की खास बात यह थी कि इसका संचालन सीधे सरकारी निगरानी में होता था, जिससे भोजन की गुणवत्ता और मात्रा पर नियंत्रण बनाए रखने का दावा किया जाता था।

भजनलाल सरकार की अन्नपूर्णा रसोई

भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद इंदिरा रसोई का नाम बदलकर अन्नपूर्णा रसोई कर दिया गया। सरकार का कहना है कि योजना के मूल उद्देश्य को और मजबूत किया गया है। आज भी भोजन की कीमत 8 रुपये प्रति थाली ही रखी गई है, लेकिन भोजन की मात्रा बढ़ाकर 600 ग्राम प्रति थाली निर्धारित की गई है।

अन्नपूर्णा रसोई में दाल, सब्जी, रोटी, चावल (श्रीअन्न) और अचार शामिल किए गए हैं। सरकार अब प्रति थाली करीब 22 रुपये का अनुदान दे रही है, जो पहले की तुलना में लगभग दोगुना है। इस योजना के तहत प्रतिदिन लगभग 2.52 लाख लोगों को भोजन कराने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, संचालन व्यवस्था में बड़ा बदलाव हुआ है। अन्नपूर्णा रसोइयों का संचालन अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न संस्थाओं को सौंपा गया है। जिला स्तरीय समितियों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार मैन्यू में बदलाव का अधिकार भी दिया गया है।

इंदिरा रसोई बनाम अन्नपूर्णा रसोई

यदि दोनों योजनाओं की तुलना की जाए, तो कागजों पर अन्नपूर्णा रसोई ज्यादा उदार नजर आती है। भोजन की मात्रा बढ़ी है, सरकारी अनुदान भी ज्यादा है और मेन्यू में चावल को शामिल किया गया है। लेकिन सवाल तब उठते हैं, जब इन दावों की पड़ताल जमीनी स्तर पर की जाती है। इंदिरा रसोई के समय जहां 450 ग्राम भोजन नियमित रूप से मिलने की बात कही जाती थी, वहीं अन्नपूर्णा रसोई में तय 600 ग्राम भोजन को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं।

जमीनी हकीकत और उठते सवाल

सरकारी दावों के विपरीत कई इलाकों से यह शिकायतें मिल रही हैं कि अन्नपूर्णा रसोइयों में निर्धारित मात्रा में भोजन नहीं दिया जा रहा। कहीं सब्जी कम दी जा रही है तो कहीं रोटी की संख्या घटाई जा रही है। राजधानी जयपुर सहित कुछ शहरों में हुई पड़ताल के दौरान यह भी सामने आया कि कई रसोइयों में थाली से चावल या अचार नदारद थे।

यहां भोजन करने वाले कई लोग गहलोत सरकार के समय की इंदिरा रसोई को याद करते हुए बताते हैं कि उस दौर में थाली भले ही छोटी थी, लेकिन सामग्री पूरी मिलती थी। खासतौर पर चावल और अचार को लेकर लोग मौजूदा व्यवस्था से असंतोष जताते नजर आते हैं। सरकार का कहना है कि अन्नपूर्णा रसोइयों की नियमित निगरानी की जा रही है और जहां भी गड़बड़ी पाई जाएगी, वहां कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों के अनुसार, मैन्यू में किसी भी तरह की कटौती स्वीकार्य नहीं है।

योजना का भविष्य और चुनौती

8 रुपये की थाली राजस्थान की सामाजिक सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा बन चुकी है। लेकिन योजना की सफलता केवल घोषणाओं और आंकड़ों से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ईमानदार क्रियान्वयन से तय होगी। इंदिरा रसोई से अन्नपूर्णा रसोई तक के सफर में सरकारों ने लक्ष्य और दावे बढ़ाए हैं, अब चुनौती यह है कि गरीब और मजदूर वर्ग को वास्तव में वही भरपेट भोजन मिले, जिसका वादा किया गया है।

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