राजस्थान में पेट्रोल और डीजल की सप्लाई को लेकर बड़ा संकट खड़ा होने की आशंका पैदा हो गई है। राज्यभर के पेट्रोल पंप संचालकों ने सरकार और तेल कंपनियों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए 1 जून 2026 से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी है। राजस्थान पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने राज्य सरकार, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग तथा प्रमुख तेल विपणन कंपनियों को स्पष्ट अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि उनकी लंबे समय से लंबित समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो पूरे प्रदेश में पेट्रोल पंप बंद कर दिए जाएंगे। इस चेतावनी के बाद प्रशासनिक और व्यापारिक हलकों में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि यदि हड़ताल होती है तो इसका सीधा असर आम जनता, परिवहन व्यवस्था और खेती-किसानी पर पड़ सकता है।
एसोसिएशन के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र सिंह भाटी ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा , खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री सुमित गोदारा और संबंधित अधिकारियों को भेजे गए विस्तृत पत्र में पेट्रोल पंप संचालकों की समस्याओं को विस्तार से रखा है। डीलर्स का कहना है कि वर्तमान समय में तेल कंपनियों और प्रशासनिक विभागों की नीतियों के कारण उनका व्यवसाय गंभीर संकट में पहुंच गया है। यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो राज्य में डीजल और पेट्रोल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
डीलर्स के अनुसार सबसे बड़ी समस्या तेल कंपनियों द्वारा लागू की गई नई पाबंदियां हैं। उनका आरोप है कि कंपनियां मांग के अनुरूप ईंधन उपलब्ध नहीं करा रही हैं। कई डिपो में तब तक पेट्रोल और डीजल की सप्लाई नहीं दी जाती जब तक स्टॉक 30 प्रतिशत तक नहीं पहुंच जाता। कुछ स्थानों पर स्थिति इतनी खराब है कि टैंक पूरी तरह खाली होने के बाद ही अगली सप्लाई भेजी जाती है। इससे पेट्रोल पंप संचालकों को ग्राहकों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है और कई बार कानून व्यवस्था की स्थिति भी बन जाती है।
इसके अलावा डीलर्स पर मौखिक और डिजिटल माध्यमों से ऐसी सीमाएं लागू की जा रही हैं जिनके तहत किसी ग्राहक को एक बार में 4900 रुपये से अधिक का पेट्रोल और 200 लीटर से अधिक डीजल देने से रोका जा रहा है। पेट्रोल पंप संचालकों का कहना है कि यह नियम व्यवहारिक नहीं हैं और मौजूदा कानूनों के भी विपरीत हैं। बड़े ट्रकों, व्यावसायिक वाहनों और किसानों को जब तय सीमा से अधिक ईंधन देने से मना किया जाता है, तब पंपों पर विवाद और झगड़े की स्थिति पैदा हो जाती है। डीलर्स का कहना है कि इन परिस्थितियों में वे ग्राहकों और प्रशासन दोनों के बीच फंसकर रह गए हैं।
एसोसिएशन ने विधिक माप विज्ञान विभाग की कार्रवाई पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। डीलर्स का आरोप है कि मशीनों में मामूली तकनीकी त्रुटियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और मीडिया में ऐसी खबरें प्रकाशित करवाई जाती हैं, जिससे पेट्रोल पंप संचालकों की छवि खराब होती है। उनका कहना है कि किसी मशीन में 25 से 27 एमएल तक की तकनीकी विसंगति को भी शॉर्ट डिलीवरी बताकर भारी जुर्माना लगाया जा रहा है, जबकि तकनीकी रूप से कोई भी मशीन पूरी तरह त्रुटिरहित नहीं हो सकती।
डीलर्स ने यह भी स्पष्ट किया कि पेट्रोल पंप संचालक केवल मशीनों के उपयोगकर्ता और संरक्षक होते हैं। मशीनों की खरीद, रखरखाव और तकनीकी सुधार की जिम्मेदारी तेल कंपनियों की होती है। मशीनों को कैलिब्रेट करने के लिए आवश्यक तकनीकी नियंत्रण और ओटीपी केवल कंपनियों के अधिकृत तकनीशियनों के पास होता है। इसके बावजूद यदि किसी मशीन में मामूली त्रुटि मिलती है तो पूरा दोष डीलर पर डाल दिया जाता है, जबकि कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। एसोसिएशन ने इसे अन्यायपूर्ण बताते हुए निष्पक्ष नीति लागू करने की मांग की है।
राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्य में किसानों से जुड़ी समस्या को भी डीलर्स ने बेहद गंभीर बताया है। जून महीने में खरीफ फसलों की बुवाई और खेतों की जुताई शुरू होने वाली है। ग्रामीण इलाकों में किसान ड्रमों और गैलनों में डीजल भरवाकर खेतों तक ले जाते हैं ताकि ट्रैक्टर, जनरेटर और पानी के इंजन चलाए जा सकें। लेकिन अब तेल कंपनियों ने ड्रमों में डीजल देने पर रोक लगा दी है। इससे किसानों के सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो गई है। डीलर्स का कहना है कि यदि समय पर किसानों को डीजल नहीं मिला तो खेती प्रभावित होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में तनाव की स्थिति बन सकती है।
पेट्रोल पंप संचालकों ने आर्थिक संकट का एक और बड़ा कारण सरकारी बकाया भुगतान को बताया है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री और अन्य वीआईपी दौरों के दौरान जिला प्रशासन और सरकारी विभागों के निर्देश पर लाखों रुपये का पेट्रोल-डीजल उधार दिया गया था, लेकिन उसका भुगतान आज तक नहीं हुआ है। चूंकि तेल कंपनियां डीलर्स को अग्रिम भुगतान पर ही ईंधन उपलब्ध कराती हैं, इसलिए बड़ी रकम फंस जाने से उनकी कार्यशील पूंजी प्रभावित हो रही है। एसोसिएशन ने सरकार को सुझाव दिया है कि भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए तेल कंपनियों के माध्यम से क्रेडिट नोट जारी किए जाएं ताकि डीलर्स पर आर्थिक बोझ न पड़े।
राजस्थान में पेट्रोल और डीजल की ऊंची कीमतों को लेकर भी डीलर्स ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि राज्य में वैट और रोड सेस की दरें देश में सबसे अधिक हैं, जिसके कारण राजस्थान में ईंधन पड़ोसी राज्यों की तुलना में 7 से 10 रुपये प्रति लीटर तक महंगा बिक रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर सीमावर्ती जिलों में दिखाई दे रहा है, जहां लोग हरियाणा, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों से सस्ता ईंधन भरवाने जा रहे हैं। इससे राजस्थान के पेट्रोल पंपों की बिक्री लगातार घट रही है और राज्य सरकार के राजस्व पर भी असर पड़ रहा है।
डीलर्स ने मांग की है कि आम जनता और व्यापारियों को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर वैट में कम से कम पांच प्रतिशत की कटौती की जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते सरकार ने इस दिशा में कदम नहीं उठाए तो प्रदेश में ईंधन संकट और आर्थिक नुकसान दोनों बढ़ सकते हैं। अब सबकी नजर राज्य सरकार पर टिकी हुई है कि वह डीलर्स की मांगों पर क्या फैसला लेती है, क्योंकि यदि 1 जून से हड़ताल शुरू हुई तो इसका असर पूरे राजस्थान के जनजीवन पर व्यापक रूप से दिखाई देगा।


