कांग्रेस ने अपने छात्र संगठन NSUI का राष्ट्रीय नेतृत्व बदलकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। इतिहास में पहली बार राजस्थान के किसी छात्र नेता को यह जिम्मेदारी मिली है। विनोद जाखड़ को NSUI का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति न केवल संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व के भीतर बदलते समीकरणों और नए सामाजिक प्रतिनिधित्व का संकेत भी देती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल द्वारा जारी पत्र ने जाखड़ की नियुक्ति पर आधिकारिक मुहर लगा दी है। उनका चयन मात्र एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि लंबी राजनीतिक यात्रा, संघर्ष, जोखिम और नेतृत्व क्षमता के परीक्षण के बाद आया हुआ परिणाम है।
राहुल गांधी की सीधी निगरानी में हुई कठिन चयन प्रक्रिया
एनएसयूआई अध्यक्ष पद के लिए इस बार चयन प्रक्रिया बेहद सख्त और बहुस्तरीय रही। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के दावेदारों के साथ स्वयं ग्रुप डिस्कशन और एक-एक करके व्यक्तिगत इंटरव्यू किए। देशभर से 15 प्रमुख छात्र नेताओं को शॉर्टलिस्ट किया गया था। दो बार पहले भी अंतिम चरण तक पहुंच चुके विनोद जाखड़ इस बार निर्णायक रूप से राहुल गांधी को प्रभावित करने में सफल रहे। जाखड़ की संगठनात्मक पकड़, संघर्षशील व्यक्तित्व और छात्रों के बीच स्वीकार्यता ने उनके पक्ष में माहौल बनाया। कांग्रेस ने साफ संकेत दिया कि संगठन में अब योग्यता और कार्यकर्ता-आधारित नेतृत्व को प्राथमिकता दी जाएगी।
बागी तेवरों का सफर—निर्दलीय लड़कर जीते और दलित नेतृत्व का नया चेहरा बने
विनोद जाखड़ का राजनीतिक सफर परंपरागत नहीं रहा। उनकी पहचान हमेशा एक फाइटर के रूप में रही है। साल 2018 में जब एनएसयूआई ने उन्हें राजस्थान विश्वविद्यालय से टिकट नहीं दिया, तब उन्होंने पीछे हटने के बजाय निर्दलीय चुनाव लड़ना चुना। उन्होंने न केवल मुकाबला किया, बल्कि जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया। वे राजस्थान विश्वविद्यालय के इतिहास में अध्यक्ष बनने वाले दलित समुदाय के पहले नेता बने। यह जीत छात्र राजनीति में एक बड़ा सामाजिक-राजनीतिक बदलाव था, जिसने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनकी जीत ने यह भी बताया कि छात्र राजनीति में टिकट वितरण से अधिक मूल्य संघर्ष और जमीनी समर्थन का होता है।
आरएसएस के शस्त्र पूजन का विरोध और जेल की सलाखों तक का सफर
जाखड़ का नेतृत्व हमेशा आक्रामक शैली के लिए जाना जाता है। हाल ही में उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय में आरएसएस के शस्त्र पूजन कार्यक्रम का विरोध करते हुए बड़ा आंदोलन खड़ा किया। उनका यह विरोध इतना तीव्र था कि उन्हें गिरफ्तार तक कर लिया गया।
लेकिन जाखड़ ने अपने रुख से पीछे हटने से इनकार कर दिया। जेल जाने का जोखिम उठाकर भी उन्होंने अपनी विचारधारा और संघर्ष की राजनीति को प्राथमिकता दी। यही तेवर कांग्रेस आलाकमान को प्रभावित करने में सफल रहे, जिसके बाद उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष पद सौंपा गया। कांग्रेस ने यह संदेश भी दिया कि वह संगठन में संघर्षशील और निर्भीक नेतृत्व को महत्व देगी।
क्या कन्हैया कुमार की पसंद पीछे रह गई?
जाखड़ की नियुक्ति के बाद कांग्रेस के भीतर की राजनीतिक चर्चाएँ भी तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि एनएसयूआई के प्रभारी कन्हैया कुमार ने इस पद के लिए प्रक्रिया पिछले वर्ष ही शुरू कर दी थी और उनकी एक अलग पसंद थी।
सूत्रों का मानना है कि कन्हैया कुमार और पूर्व अध्यक्ष वरुण चौधरी के बीच संगठनात्मक असहमति भी बनी हुई थी। इस बार राहुल गांधी ने पूरी प्रक्रिया स्वयं संचालित की और अंतिम निर्णय योग्यता व संघर्ष के आधार पर लिया। कहा जा रहा है कि राहुल गांधी ने किसी गुट की बजाय एक ऐसे नेता का चयन किया, जो राष्ट्रव्यापी संगठन को नई दिशा दे सके। इस तरह, जाखड़ की नियुक्ति कई पुराने समीकरणों को भी बदलने वाली साबित हो सकती है।
राजस्थान को मिला बड़ा सम्मान, कांग्रेस का रणनीतिक संकेत
एनएसयूआई का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद कांग्रेस के भीतर भविष्य के नेतृत्व का पहला चरण माना जाता है। ऐसे में इस पद का राजस्थान को मिलना प्रदेश कांग्रेस के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह नियुक्ति राजस्थान में सामाजिक संतुलन, युवा नेतृत्व और संगठनात्मक विस्तार की रणनीति से भी जुड़ी हुई है। कांग्रेस ने यह संदेश दिया है कि वह अगली पीढ़ी के नेताओं को अब ज़्यादा जिम्मेदारी देने को तैयार है।


