मनीषा शर्मा। फिल्म प्रोड्यूसर-डायरेक्टर विक्रम भट्ट और उनकी पत्नी श्वेतांबरी भट्ट की गिरफ्तारी से जुड़े मामले में राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर की एकलपीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए जांच एजेंसियों से तीखे सवाल किए हैं। जस्टिस समीर जैन की अदालत ने इस मामले की सुनवाई के दौरान उदयपुर आईजी गौरव श्रीवास्तव और एसपी योगेश गोयल को वर्चुअली कोर्ट के सामने पेश होने के आदेश दिए थे, जिनका पालन करते हुए दोनों अधिकारी आज अदालत के समक्ष उपस्थित हुए।
करीब डेढ़ घंटे तक चली सुनवाई में कोर्ट ने याचिकाकर्ता और प्रतिवादी दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और मामले के तथ्यों पर विस्तार से विचार किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच की प्रक्रिया, गिरफ्तारी की जल्दबाजी और एफआईआर दर्ज करने के आधार को लेकर कई अहम सवाल उठाए। एक समय पर कोर्ट ने पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई से कराने तक की टिप्पणी कर दी, हालांकि इस संबंध में फिलहाल कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया गया।
सुनवाई के अंत में जस्टिस समीर जैन ने 42 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े इस विवाद में दर्ज एफआईआर पर फैसला सुरक्षित रख लिया। अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट के आने वाले आदेश पर टिकी हैं, जो इस मामले की दिशा और दशा तय करेगा।
इससे पहले यह जानना जरूरी है कि मामला क्या है। राजस्थान के इंदिरा ग्रुप ऑफ कंपनीज के मालिक डॉ. अजय मुर्डिया ने विक्रम भट्ट के साथ एक फिल्म निर्माण के लिए करीब 42 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया था। बाद में डॉ. मुर्डिया ने खुद को ठगा हुआ महसूस करते हुए 17 नवंबर को उदयपुर में विक्रम भट्ट समेत आठ लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया। एफआईआर दर्ज होने के बाद उदयपुर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए विक्रम भट्ट के को-प्रोड्यूसर महबूब अंसारी और कथित फर्जी वेंडर संदीप को मुंबई से गिरफ्तार किया।
इसके बाद 7 दिसंबर को विक्रम भट्ट और उनकी पत्नी श्वेतांबरी भट्ट को मुंबई स्थित उनके फ्लैट से गिरफ्तार किया गया। दोनों को 9 दिसंबर को उदयपुर कोर्ट में पेश कर रिमांड पर लिया गया। इसी दिन राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर बेंच में विक्रम भट्ट की ओर से गिरफ्तारी पर रोक लगाने को लेकर याचिका पर सुनवाई हुई थी। उस सुनवाई में हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी में कथित जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए आईजी, एसपी और जांच अधिकारी को कोर्ट में तलब किया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता महेंद्र गोदारा ने अदालत में दलील दी कि यह पूरा मामला सिविल प्रकृति का है, जिसे आपराधिक रंग दिया गया है। उन्होंने कहा कि विक्रम भट्ट फिल्म इंडस्ट्री के प्रतिष्ठित प्रोड्यूसर-डायरेक्टर हैं और समाज में उनकी गहरी साख है। वकील ने तर्क दिया कि पक्षकारों के बीच फिल्म निर्माण को लेकर विधिवत कॉन्ट्रैक्ट हुआ था, जिसमें 42 करोड़ रुपये की राशि तय थी और उस कॉन्ट्रैक्ट को लागू भी किया गया।
वकील ने कहा कि एफआईआर पढ़ने से स्पष्ट होता है कि यह एक कॉन्ट्रैक्चुअल विवाद है, न कि आपराधिक धोखाधड़ी का मामला। इसके बावजूद भट्ट दंपती पर चीटिंग और विश्वासघात जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मामले में कोई प्रारंभिक जांच नहीं की गई और जल्दबाजी में गिरफ्तारी कर ली गई।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार और स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजनलाल मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि CrPC की धारा 482 के तहत कोर्ट को यह अधिकार है कि वह न्याय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोके और उचित न्याय सुनिश्चित करे।
दूसरी ओर सरकारी वकील ने याचिकाकर्ताओं के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के कर्मचारियों के बयान दर्ज करने के बाद प्रारंभिक जांच की गई थी। इसके पश्चात कानून के तहत विधिवत रूप से गिरफ्तारी की गई। सरकारी पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि विक्रम भट्ट द्वारा अतिरंजित खर्च किए गए, जिससे विश्वासघात और धोखाधड़ी का अपराध बनता है।
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम फैसला सुनाने से इनकार करते हुए एफआईआर से जुड़े मुद्दे पर आदेश सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट की सख्त टिप्पणियों और सीबीआई जांच की संभावना पर की गई टिप्पणी ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राजस्थान हाईकोर्ट का अंतिम आदेश इस हाई-प्रोफाइल मामले में क्या रुख अपनाता है।


