मनीषा शर्मा।,अजमेर। सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ गरीब नवाज की दरगाह पर बुधवार को पारंपरिक झंडा रस्म अदा की गई। बुलंद दरवाजे पर झंडा चढ़ाए जाने के साथ ही 814वें सालाना उर्स की अनौपचारिक शुरुआत हो गई। यह ऐतिहासिक रस्म भीलवाड़ा के गौरी परिवार द्वारा निभाई गई, जो बीते 82 वर्षों से लगातार इस परंपरा को निभाता आ रहा है। झंडा रस्म को देखने और उसमें शामिल होने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में अकीदतमंद अजमेर पहुंचे। दरगाह परिसर “ख्वाजा की जय” और सूफियाना कलाम की गूंज से सराबोर हो गया।
असर की नमाज के बाद निकला झंडे का जुलूस
असर की नमाज के बाद दरगाह के लंगरखाने से झंडे का जुलूस शुरू हुआ। जुलूस जैसे-जैसे आगे बढ़ा, अकीदतमंदों का सैलाब उमड़ पड़ा। हाथों में चादरें, फूल और झंडे लिए जायरीन पूरी अकीदत के साथ रस्म में शरीक हुए। जुलूस बुलंद दरवाजे तक पहुंचा, जहां विधि-विधान के साथ झंडा चढ़ाया गया। झंडा चढ़ाए जाने के दौरान 25 तोपों की सलामी दी गई, जिससे पूरे दरगाह क्षेत्र में उत्सव और श्रद्धा का माहौल बन गया। यह दृश्य दरगाह की सदियों पुरानी परंपरा और सूफी संस्कृति की जीवंत झलक पेश करता है।
रजब का चांद दिखने पर होगा उर्स का औपचारिक आगाज
हालांकि झंडा रस्म के साथ उर्स की अनौपचारिक शुरुआत हो गई है, लेकिन 814वां सालाना उर्स इस्लामी कैलेंडर के रजब महीने का चांद दिखने के बाद औपचारिक रूप से शुरू होगा। उर्स के दौरान दरगाह में कई धार्मिक और सूफियाना कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें महफिल-ए-समा, कुरआन ख्वानी और विशेष दुआएं शामिल होंगी। उर्स के दिनों में अजमेर शरीफ दरगाह पर देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी जायरीन पहुंचते हैं और अमन, चैन और भाईचारे की दुआ करते हैं।
82 वर्षों से गौरी परिवार निभा रहा परंपरा
भीलवाड़ा का गौरी परिवार पिछले 82 वर्षों से लगातार झंडा रस्म अदा करता आ रहा है। यह परंपरा दरगाह के इतिहास और आस्था से गहराई से जुड़ी हुई है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि यह उनके लिए सौभाग्य की बात है कि उन्हें हर साल यह जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिलता है। यह परंपरा न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि अजमेर दरगाह की साझा संस्कृति और विरासत को भी दर्शाती है।
पुख्ता सुरक्षा इंतजाम, चप्पे-चप्पे पर नजर
झंडा रस्म और उर्स की भीड़ को देखते हुए पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। दरगाह क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। सीसीटीवी कैमरों के जरिए लगातार निगरानी रखी गई, वहीं ड्रोन से भी पूरे इलाके पर नजर रखी गई। भीड़ नियंत्रण के लिए बैरिकेडिंग की गई, ताकि अकीदतमंदों को किसी तरह की असुविधा न हो। प्रशासन का कहना है कि उर्स के दौरान भी सुरक्षा व्यवस्था इसी तरह सख्त रहेगी।
आस्था और अमन का संदेश देता उर्स
अजमेर शरीफ का उर्स सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे, प्रेम और इंसानियत का संदेश देता है। झंडा रस्म के साथ शुरू हुआ यह सिलसिला आने वाले दिनों में पूरे विश्व से आए जायरीन को एक सूत्र में बांधेगा और सूफी परंपरा की महान विरासत को आगे बढ़ाएगा।


