राजस्थान विधानसभा के प्रश्नकाल में आज उस समय तनावपूर्ण माहौल बन गया, जब राइट टू हेल्थ एक्ट (Right to Health Act) से जुड़े एक सवाल पर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने आ गए। कांग्रेस विधायक हरिमोहन शर्मा ने मुद्दा उठाते हुए कहा कि राइट टू हेल्थ एक्ट को राज्य सरकार ने 12 अप्रैल 2023 को अधिसूचित किया था, लेकिन दो साल बीत जाने के बावजूद इसके नियम आज तक नहीं बनाए गए हैं। उन्होंने गंभीर सवाल उठाया कि इतने महत्वपूर्ण कानून को लागू करने में देरी क्यों हुई और वर्तमान सरकार इसका पालन करने को लेकर स्पष्ट रुख क्यों नहीं दिखा रही है।
स्वास्थ्य मंत्री का जवाब और राजनीतिक आरोप
विधायक के प्रश्न का जवाब देते हुए स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने कहा कि यह कानून कांग्रेस सरकार द्वारा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जल्दबाजी में और राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से लाया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि विधेयक लाते समय किसी भी हितधारक की सलाह नहीं ली गई। मंत्री ने कहा कि वर्तमान भाजपा सरकार एमएए योजना के माध्यम से व्यापक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करा रही है और राज्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही स्वास्थ्य मॉडल को आगे बढ़ा रही है।
उन्होंने साफ तौर पर कहा कि एमएए योजना पहले से ही कई प्रकार की सुविधाएं शामिल करती है और ऐसे में राइट टू हेल्थ एक्ट की आवश्यकता नहीं रह जाती। मंत्री ने यह भी सवाल उठाया कि यदि कांग्रेस सरकार इस कानून के प्रति इतनी गंभीर थी, तो अपने कार्यकाल में नियम क्यों नहीं बनाए।
विपक्ष का तीखा रिएक्शन और सदन में हंगामा
स्वास्थ्य मंत्री के इस बयान पर कांग्रेस विधायकों ने तीखी आपत्ति जताई। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने मंत्री के जवाब को टालमटोल वाला बताते हुए कहा कि सरकार स्पष्ट करे कि वह इस कानून के नियम बनाने का इरादा रखती भी है या नहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार जनता के स्वास्थ्य अधिकार को कमजोर करने का प्रयास कर रही है।
जैसे ही मंत्री ने कांग्रेस सरकार पर राजनीतिक कानून बनाने का आरोप लगाया, विपक्षी विधायक आक्रोशित होकर सदन के वेल में पहुंच गए और जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी। स्पीकर वासुदेव देवनानी को कई बार व्यवस्था बनाए रखने की अपील करनी पड़ी। उन्होंने कहा कि यदि हंगामा जारी रहा तो सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ेगी। कुछ देर के बाद विपक्षी सदस्य अपनी सीटों पर लौटे, लेकिन मंत्री के बयान पर असंतोष जताते हुए कांग्रेस विधायकों ने बाद में सदन से वॉकआउट कर दिया।
गहलोत का कड़ा हमला: मंत्री का बयान ‘निंदनीय’
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य मंत्री का यह कहना कि राइट टू हेल्थ एक्ट की आवश्यकता नहीं है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है। गहलोत के अनुसार यह बयान उन गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की पीड़ा को नजरअंदाज करने जैसा है, जो महंगे इलाज के कारण आर्थिक बोझ से दबे रहते हैं।
गहलोत ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस सरकार ने चिरंजीवी योजना और निरोगी राजस्थान जैसे बड़े स्वास्थ्य मॉडल लागू करने के बावजूद राइट टू हेल्थ की परिकल्पना इसलिए की थी ताकि आपातकालीन स्थिति में कोई भी मरीज इलाज से वंचित न रहे।
उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा भाजपा सरकार मेडिकल लॉबी के दबाव में काम कर रही है और कानून को लागू करने के लिए जरूरी नियम बनाने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि सरकार अब बहाने बनाकर जनता के अधिकारों से समझौता कर रही है, जबकि कांग्रेस सरकार इस कानून के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाना चाहती थी।
राजनीतिक व स्वास्थ्य नीति के टकराव का बड़ा संकेत
राइट टू हेल्थ एक्ट को लेकर सदन में हुआ यह विवाद राजस्थान की स्वास्थ्य नीति में दो विचारधाराओं के टकराव को स्पष्ट रूप से सामने लाता है। एक ओर कांग्रेस है, जो इस कानून को जनता के मौलिक स्वास्थ्य अधिकार से जोड़कर देखती है, जबकि दूसरी ओर भाजपा सरकार एमएए योजना को अधिक प्रभावी बताते हुए नए कानून को अनावश्यक मानती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन सकता है, क्योंकि स्वास्थ्य सेवाएं राजस्थान की प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं। विधानसभा में हुआ हंगामा इस बात का संकेत है कि राइट टू हेल्थ एक्ट आने वाले समय में बड़ा चुनावी मुद्दा भी बन सकता है।


