उदयपुर में विद्या प्रचारिणी सभा से जुड़ा विवाद लगातार गहराता जा रहा है। सभा के सदस्य और चित्तौड़गढ़ के पूर्व जिला प्रमुख भेरूसिंह चौहान द्वारा सभा के प्रधान संरक्षक एवं नाथद्वारा विधायक विश्वराजसिंह मेवाड़ पर की गई कथित अभद्र टिप्पणी के बाद मामला अब सामाजिक और प्रशासनिक स्तर तक पहुंच गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने उदयपुर और मेवाड़ क्षेत्र की राजनीति, सामाजिक संगठनों और शिक्षा संस्थानों में नई बहस छेड़ दी है।
इस मामले में देवड़ा नोबल्स सोसायटी ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर कार्रवाई की मांग की है। सोसायटी के पदाधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक मंच से की गई ऐसी टिप्पणियां न केवल एक जनप्रतिनिधि का अपमान हैं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक सम्मान के भी विरुद्ध हैं। संगठन ने प्रशासन से मामले को गंभीरता से लेते हुए उचित कदम उठाने की मांग की है।
सोसायटी अध्यक्ष हरिसिंह देवड़ा ने बताया कि BN University में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सभा के कुछ सदस्यों द्वारा विश्वराजसिंह मेवाड़ के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया गया। उनके अनुसार इस बयानबाजी से मेवाड़ क्षेत्र के लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। उन्होंने कहा कि मेवाड़ की ऐतिहासिक विरासत, परंपरा और सम्मान को देखते हुए सार्वजनिक जीवन में मर्यादित भाषा का प्रयोग होना चाहिए।
यह विवाद तब और बढ़ गया जब भेरूसिंह चौहान के बयान के कुछ अंश सामने आए। उन्होंने सभा की संपत्तियों, प्रबंधन और संरक्षक की भूमिका को लेकर सवाल उठाए थे। साथ ही विश्वराजसिंह मेवाड़ के संदर्भ में विवादित और तीखी राजनीतिक टिप्पणियां भी की थीं। बयान में उन्होंने पुरानी राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा था कि अलग-अलग राजनीतिक दलों में जाने से कुछ लोगों की छवि और दूसरों की राजनीति प्रभावित हुई। इन टिप्पणियों के बाद मामला तेजी से चर्चा में आ गया।
हालांकि बयान पर विवाद बढ़ने के अगले ही दिन भेरूसिंह चौहान ने सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली थी। इसके बावजूद विवाद शांत नहीं हुआ और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इसे गंभीर विषय बताते हुए प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। कई लोगों का कहना है कि माफी मांगना सकारात्मक कदम है, लेकिन सार्वजनिक मंच से दिए गए बयान का असर व्यापक होता है, इसलिए जिम्मेदार पदों पर रहे लोगों को शब्दों का चयन सावधानी से करना चाहिए।
विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्या प्रचारिणी सभा के प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर भी संघर्ष जारी है। सभा के वर्तमान प्रबंधन का कार्यकाल 12 फरवरी 2026 को समाप्त हो चुका था। इसके बाद नए चुनाव कराए जाने थे, लेकिन 54 नए सदस्यों को जोड़ने के मुद्दे पर विवाद खड़ा हो गया। इसी के बाद पूर्व कार्यकारिणी और मुख्य संरक्षक की ओर से गठित एडहॉक कमेटी के बीच अधिकारों को लेकर टकराव शुरू हो गया।
सूत्रों के अनुसार दोनों पक्षों के बीच प्रशासनिक नियंत्रण, सदस्यता और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सहमति नहीं बन पाई। मामला अब न्यायालय में विचाराधीन है और अगली सुनवाई 27 अप्रैल को निर्धारित बताई जा रही है। कानूनी प्रक्रिया जारी रहने के कारण संस्था का नियमित कामकाज भी प्रभावित हो रहा है।
स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब 15 अप्रैल को एडहॉक कमेटी संस्था का चार्ज लेने पहुंची। उस दौरान सभा के एमडी, फाइनेंस सेक्रेट्री, रजिस्ट्रार और ऑडिटर कार्यालयों पर ताले लगे मिले। बताया जा रहा है कि तब से अब तक ये कार्यालय बंद हैं। इससे संस्था के कई प्रशासनिक कार्य रुक गए हैं।
कार्यालय बंद होने के कारण एडमिशन प्रक्रिया, परीक्षा संबंधी कार्य, मैनेजमेंट फैसले और छात्रों से जुड़े कई जरूरी मुद्दे लंबित पड़े हैं। विद्यार्थियों और अभिभावकों में भी इस स्थिति को लेकर चिंता बढ़ रही है। शिक्षा संस्थानों से जुड़े लोग मानते हैं कि यदि विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो इसका असर छात्रों के भविष्य और संस्थान की साख दोनों पर पड़ सकता है।
विद्या प्रचारिणी सभा लंबे समय से शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय संस्था मानी जाती है। ऐसे में इसके भीतर चल रहा विवाद केवल आंतरिक प्रशासनिक मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक महत्व का विषय बन गया है। संस्था से जुड़े कॉलेजों और शैक्षणिक इकाइयों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या बड़ी है, इसलिए व्यवस्थागत ठहराव चिंता का कारण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में संवाद, पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया का सम्मान सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि दोनों पक्ष बैठकर समाधान निकालें, तो संस्था के हित में बेहतर रास्ता निकल सकता है। वहीं सार्वजनिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप से तनाव और बढ़ने की आशंका रहती है।


