शोभना शर्मा । अमेरिका और भारत के रिश्तों को दुनिया की सबसे अहम रणनीतिक साझेदारियों में गिना जाता है। लेकिन हाल के महीनों में यह रिश्ता गहरी दरारों से गुजर रहा है। वजह है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगातार विवादित फैसले और बयान, जिनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके समीकरण बिगड़ते चले गए हैं। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर कुल 50% टैरिफ लगाया है। इसमें 25% आयात शुल्क अमेरिका के बढ़ते व्यापार घाटे को कम करने के नाम पर लगाया गया, जबकि अतिरिक्त 25% टैरिफ रूस से तेल खरीदने पर एक तरह के जुर्माने के तौर पर। इसके बावजूद भारत ने न तो अपने सेक्टर्स को अमेरिकी उत्पादों के लिए तुरंत खोला और न ही रूस से तेल खरीद कम करने की हामी भरी। हालांकि, अब सामने आया है कि इन टैरिफ़्स की असली वजह आर्थिक या रणनीतिक नहीं, बल्कि 17 जून को हुई एक फोन कॉल थी, जिसके बाद ट्रंप का भारत के प्रति रुख और कठोर हो गया।
17 जून का फोन कॉल और नोबेल शांति पुरस्कार का मामला
अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष को रोकने में बड़ी भूमिका निभाई। इतना ही नहीं, उन्होंने खुद को इस संघर्ष विराम का नायक बताते हुए पीएम मोदी को फोन किया और कहा कि पाकिस्तान उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने वाला है। यह संकेत था कि वे चाहते थे कि मोदी भी कुछ ऐसा ही करें। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि भारत-पाकिस्तान संघर्ष विराम में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं रही और यह पूरी तरह आपसी बातचीत से संभव हुआ। ट्रंप ने इस असहमति को नज़रअंदाज करने की कोशिश की, लेकिन मोदी के स्पष्ट रुख और नोबेल के मुद्दे पर चुप्पी ने दोनों नेताओं के बीच की दूरी को और गहरा कर दिया।
H1B वीज़ा और प्रवासियों पर विवाद
रिश्तों की खटास की एक और बड़ी वजह बनी अमेरिकी वीज़ा नीति। ट्रंप प्रशासन लंबे समय से अपने “Make America Great Again” अभियान के तहत H1B वीज़ा की समीक्षा कर रहा है। यह वीज़ा भारत के लाखों आईटी प्रोफेशनल्स के लिए रोजगार का प्रमुख साधन है। इसके अलावा, अवैध भारतीय प्रवासियों को बेड़ियों में बांधकर डिपोर्ट करने की घटनाओं ने भी भारतीय समाज और सरकार को आहत किया। इन फैसलों ने दोनों देशों के बीच भरोसे की खाई और चौड़ी कर दी।
US वॉशिंगटन न्योते पर मोदी का इनकार
जून में G7 सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने अचानक पीएम मोदी को वॉशिंगटन आने का न्योता दिया। लेकिन पीएम मोदी ने अपने शेड्यूल का हवाला देकर इसे ठुकरा दिया। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि उसी समय पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर अमेरिका में मौजूद थे और ट्रंप तीनों नेताओं के बीच मुलाकात करवाना चाहते थे। भारत ने इसे समझ लिया और मोदी ने आमंत्रण ठुकरा कर एक तरह से इस “ट्रैप” से खुद को बचा लिया।
“मृत अर्थव्यवस्था” वाली टिप्पणी
भारत पर भारी टैरिफ लगाने के बाद जब मोदी सरकार ने कोई समझौता नहीं किया, तो ट्रंप ने भारत की अर्थव्यवस्था को “डेड इकोनॉमी” (मृत अर्थव्यवस्था) कह डाला। जर्मन मीडिया और जापानी अखबार निक्केई एशिया ने भी रिपोर्ट किया कि मोदी को ट्रंप की इस तरह की टिप्पणियां बेहद नागवार गुज़रीं। इससे रिश्तों में तनाव और गहरा हो गया।
मोदी के फोन न उठाने की शिकायत
न्यूयॉर्क टाइम्स ने जर्मन मीडिया समूह FAZ की रिपोर्ट को पुष्ट करते हुए कहा कि पीएम मोदी ने ट्रंप के कई फोन कॉल्स का जवाब नहीं दिया। दरअसल, ट्रंप भारत-अमेरिका के बीच एक “मिनी ट्रेड डील” करना चाहते थे। लेकिन अमेरिकी अधिकारियों को डर था कि ट्रंप अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म Truth Social पर समझौते को तोड़-मरोड़कर पेश कर सकते हैं। जब बातचीत आगे नहीं बढ़ी, तो मोदी ने ट्रंप की कॉल्स का जवाब ही देना बंद कर दिया। व्हाइट हाउस की तरफ़ से भी यह मान लिया गया कि कई बार ट्रंप ने कॉल की कोशिश की, लेकिन संवाद नहीं हो सका।
भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की जिद और नोबेल शांति पुरस्कार की चाहत ने भारत-अमेरिका संबंधों में खटास डाल दी। रिपोर्ट्स के अनुसार, साल की शुरुआत में जब मोदी अमेरिका गए थे, तो ट्रंप ने वादा किया था कि वे साल के अंत में क्वाड सम्मेलन के लिए भारत आएंगे। लेकिन अब इस दौरे की कोई योजना नहीं है। भारत में अब ट्रंप को ऐसे नेता के रूप में देखा जा रहा है, जो साझेदारी से ज्यादा धमकाने और दबाव बनाने की रणनीति अपनाते हैं। एक भारतीय अधिकारी ने तो उनके रवैये को “गुंडागर्दी” तक कह डाला।
भारत और अमेरिका का रिश्ता केवल रणनीतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक और तकनीकी स्तर पर भी बेहद अहम है। लेकिन हाल के महीनों में राष्ट्रपति ट्रंप की आक्रामक नीतियों और पाकिस्तान पर उनके बयानों ने इस रिश्ते को कमजोर कर दिया है। 50% टैरिफ, H1B वीज़ा विवाद, नोबेल की राजनीति और मोदी के प्रति अपमानजनक बयान — इन सबने मिलकर ट्रंप और मोदी के रिश्ते को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां सहयोग की जगह अविश्वास ने ले ली है। अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले महीनों में दोनों देश तनाव को पीछे छोड़कर अपने रिश्तों को नई दिशा देने में सफल होंगे या फिर यह खटास लंबे समय तक बनी रहेगी।