अजमेर शरीफ स्थित ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की दरगाह में परंपरागत बसंत की रस्म श्रद्धा, आस्था और आपसी सौहार्द के वातावरण में अदा की गई। यह आयोजन हजरत सज्जादानशीन साहब के जानशीन हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती साहब की सदारत में सम्पन्न हुआ, जिसमें विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों की भागीदारी ने गंगा-जमुनी तहज़ीब की सशक्त झलक प्रस्तुत की।
निज़ाम गेट से आस्तान-ए-शरीफ तक निकला सूफियाना जुलूस
बसंत की रस्म के दौरान दरगाह के निज़ाम गेट से मौरूसी क़व्वालों ने हाथों में बसंत का गड़बा लेकर बसंती कलाम पढ़ते हुए आस्तान-ए-शरीफ की ओर जुलूस के रूप में प्रस्थान किया। पूरे मार्ग में सूफियाना कलाम, बसंत के गीत और रूहानी माहौल से दरगाह परिसर सराबोर रहा। आस्तान-ए-शरीफ पहुंचने पर हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती साहब ने ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की मजार पर विधिवत बसंत पेश की।
गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत प्रतीक है बसंत की रस्म
इस अवसर पर अपने संबोधन में हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती साहब ने कहा कि अजमेर शरीफ दरगाह में अदा की जाने वाली बसंत की रस्म भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यहां विभिन्न धर्मों और मजहबों के लोग प्रेम, भाईचारे और आपसी सम्मान के साथ एक-दूसरे की परंपराओं को निभाते हैं। भारत की संस्कृति और परंपराएं सदियों से समाज को जोड़ने का कार्य करती आ रही हैं और सामाजिक सौहार्द को मजबूत बनाती हैं।
सूफी संतों का पैग़ाम आज भी प्रासंगिक
हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने कहा कि सूफी संतों और बुज़ुर्गों ने मोहब्बत, अमन और इंसानियत का जो पैग़ाम दिया, वही संदेश आज भी दरगाहों के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि बसंत जैसे आयोजन उन ताक़तों को स्पष्ट संदेश देते हैं, जो धर्म के नाम पर समाज में नफ़रत फैलाने की कोशिश करते हैं।
भारत विविधताओं की माला, यही है इसकी पहचान
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान एक अनमोल माला की तरह है, जिसमें विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं के मोती पिरोए गए हैं। यही विविधता भारत को विश्व पटल पर एक विशिष्ट पहचान दिलाती है। अंत में उन्होंने कहा कि लगभग 800 वर्षों से अजमेर शरीफ दरगाह मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम देती आ रही है और भविष्य में भी यह दरगाह समाज को जोड़ने का कार्य करती रहेगी।


