मनीषा शर्मा। राजस्थान के कृषि इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। प्रदेश में विकसित खजूर की तीन विशिष्ट किस्मों को भारत सरकार के पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (PPV&FRA) ने आधिकारिक तौर पर पेटेंट प्रदान कर दिया है। यह उपलब्धि इसलिए खास है, क्योंकि देश में पहली बार खजूर की किसी किसान-किस्म को कानूनी संरक्षण मिला है। इन किस्मों को तैयार करने के पीछे पूर्व कृषि मंत्री और अनुभवी कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रभुलाल सैनी का लंबा शोध, समर्पण और लगातार किया गया प्रयोग जुड़ा हुआ है।
डॉ. सैनी ने बताया कि इन किस्मों को विकसित करने में लगभग दस वर्षों का समय लगा। इस दौरान वैज्ञानिकों ने इनके विशिष्ट गुण, उत्पादकता, गुणवत्ता और अनुकूलन क्षमता का गहन परीक्षण किया। 16 सितंबर 2021 को आवेदन प्रक्रिया शुरू हुई और विभिन्न चरणों में परीक्षण, सत्यापन और मूल्यांकन के बाद दिसंबर 2025 में पेटेंट की अंतिम स्वीकृति दी गई। यह मान्यता अधिनियम 2001 के प्रावधानों के अंतर्गत प्रदान की गई है।
इस पेटेंट के साथ ST-1, ST-2 और ST-3 किस्मों के उत्पादन, विक्रय, विपणन और आयात-निर्यात का विशेष अधिकार अब डॉ. सैनी के पास सुरक्षित रहेगा। इन किस्मों को अगले 18 वर्षों तक कानूनी संरक्षण प्राप्त रहेगा। इससे न केवल शोधकर्ता को सम्मान मिला है, बल्कि देशभर के किसानों को भी नई दिशा और प्रेरणा मिली है कि कृषि में वैज्ञानिक प्रयोग और नवाचार भविष्य गढ़ सकते हैं।
खजूर की इन किस्मों की खासियत यह है कि ये शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं। वर्तमान में प्रति पेड़ 50 से 100 किलोग्राम तक उत्पादन देखा गया है, जबकि उत्पादन क्षमता को दो क्विंटल तक बढ़ाने पर भी वैज्ञानिक अध्ययन जारी है। साथ ही इन किस्मों पर कीटरोधी परीक्षण भी किए जा रहे हैं, ताकि किसानों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिल सके। इस उपलब्धि के बाद क्षेत्र के किसानों में उत्साह देखने को मिला है। उनका कहना है कि यह सफलता प्रधानमंत्री के अनुसंधान-केन्द्रित कृषि विजन को साकार करती है। इससे किसानों को नई फसलों और तकनीकों के प्रयोग के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
डॉ. प्रभुलाल सैनी: नवाचार के प्रतीक
टोंक जिले के आंवा गांव निवासी डॉ. प्रभुलाल सैनी दो बार राजस्थान सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। 2003–2008 और 2013–2018 के बीच उन्होंने कृषि विभाग का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल में राज्य में कई बड़े प्रयोग हुए। जैतून की खेती को बढ़ावा देना और इजराइल की बूंद-बूंद सिंचाई तकनीक को लाना उनके प्रमुख योगदान माने जाते हैं। आज वे संगठनात्मक जिम्मेदारियों के साथ-साथ किसानों के लिए नए समाधान खोजने में सक्रिय हैं। खजूर की इन किस्मों पर मिला पेटेंट उनके निरंतर प्रयासों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता है।


