शोभना शर्मा। राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में अरावली पर्वतमाला के संरक्षण की लड़ाई आज की नहीं है। इस संघर्ष की जड़ें तीन दशक पहले तक जाती हैं, जब सीकर जिले के नीमकाथाना क्षेत्र के किसान कैलाश मीना ने अवैध खनन के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की थी। पेशे से किसान और सामाजिक सरोकारों से गहराई से जुड़े कैलाश मीना खुद को किसी तरह का एक्टिविस्ट नहीं मानते। उनका कहना है कि यह संघर्ष किसी पहचान या मंच के लिए नहीं, बल्कि अपने और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व की रक्षा के लिए है।
अरावली पर्वतमाला न केवल राजस्थान की पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भूजल संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय आजीविका का भी आधार है। इसके बावजूद वर्षों से यहां अवैध बजरी खनन और पत्थर खनन का खेल जारी है। इसी के खिलाफ कैलाश मीना पिछले 30 वर्षों से लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
शिकायतों से जन आंदोलन तक का सफर
कैलाश मीना बताते हैं कि शुरुआत में उन्होंने प्रशासनिक रास्ता अपनाया। जिला प्रशासन, राज्य सरकार और संबंधित विभागों को पत्र लिखे गए, शिकायतें दी गईं और अवैध खनन के सबूत सौंपे गए। लेकिन जब लगातार अनदेखी होती रही, तब उन्होंने जन आंदोलन का रास्ता चुना।
वे गांव-गांव गए, पंचायत सभाओं में लोगों से संवाद किया और अरावली पर्वतमाला के अंधाधुंध दोहन से होने वाले दुष्परिणामों को समझाया। पानी के गिरते स्तर, खेती पर पड़ते असर और पर्यावरणीय नुकसान को उन्होंने सरल भाषा में ग्रामीणों के सामने रखा। कैलाश मीना का आरोप है कि खनन माफिया का स्थानीय नेताओं और कुछ अधिकारियों से गहरा गठजोड़ रहा है, जिसके कारण यह लड़ाई कभी आसान नहीं रही। उनका कहना है कि यह आंदोलन तब शुरू हुआ, जब कुछ किसान और ग्रामीण अवैध खनन से परेशान होकर उनके पास पहुंचे। तभी उन्होंने तय किया कि चुप बैठना विकल्प नहीं है। तीन दशक बीत जाने के बाद भी यह संघर्ष जारी है और अंत अभी दूर नजर आता है।
हमले, धमकियां और डर के साये में जीवन
इस लड़ाई की कीमत कैलाश मीना को व्यक्तिगत स्तर पर भारी चुकानी पड़ी। वे बताते हैं कि खनन माफिया की ओर से उन पर अब तक आठ बार जानलेवा हमले किए गए। पहला बड़ा हमला वर्ष 2011 में हुआ, जब वे जयपुर से नीमकाथाना लौट रहे थे। सड़क किनारे उनकी गाड़ी रोककर लाठी-रॉड से हमला किया गया। खेतों में काम कर रहे लोगों ने शोर सुनकर मौके पर पहुंचकर उनकी जान बचाई। इसके अलावा डंपर से कुचलने और बाइक को टक्कर मारने की कोशिशें भी की गईं। आखिरी हमला 2017 में हुआ। इन घटनाओं के बाद उनका जीवन लगातार डर और असुरक्षा के साये में रहा।
परिवार की चिंता और दोस्तों का सहारा
हमलों के बाद कैलाश मीना के परिवार की चिंता बढ़ गई। सूरज ढलने से पहले घर लौटना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। बेटे, दोस्त और गांव के साथी दिन में कई बार उनकी लोकेशन लेते हैं। पहले वे पैदल या बस से सफर करते थे, लेकिन सुरक्षा को देखते हुए दोस्तों ने चंदा जुटाकर उन्हें एक गाड़ी दिलवाई। पिछले 19 वर्षों से उसी गाड़ी का पूरा खर्च वही दोस्त उठा रहे हैं।
झूठे मुकदमे और निजी नुकसान
खनन माफिया से टकराव का एक और चेहरा झूठे मुकदमे रहे। कैलाश मीना पर अब तक 24 मुकदमे दर्ज किए गए, जिनमें से 21 में उन्हें अदालत से राहत मिल चुकी है। वर्ष 2011 उनके जीवन का सबसे कठिन दौर साबित हुआ। उसी साल उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया और अर्धनग्न अवस्था में सड़क पर परेड कराई गई। इस मानसिक आघात का असर उनके परिवार पर भी पड़ा। कुछ ही दिनों बाद उनके बड़े भाई मुरारीलाल का निधन हो गया। हाल ही में पत्नी के निधन ने भी उन्हें गहरा आघात पहुंचाया, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने संघर्ष को नहीं छोड़ा।
आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद
आज भी कैलाश मीना उसी उम्मीद के साथ लड़ रहे हैं कि एक दिन अरावली पर्वतमाला सुरक्षित होगी। उनका मानना है कि अगर आज प्रकृति को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के पास केवल पछतावा बचेगा। नीमकाथाना का यह किसान अपने सीमित संसाधनों के बावजूद एक बड़े पर्यावरणीय संकट के खिलाफ खड़ा है और उसकी लड़ाई शेखावाटी ही नहीं, पूरे राजस्थान के लिए एक उदाहरण बन चुकी है।


