मनीषा शर्मा। सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की पवित्र दरगाह पर 814वें सालाना उर्स की तैयारियां पूरे शबाब पर हैं। उर्स की अनौपचारिक शुरुआत 17 दिसंबर को उस वक्त मानी जाएगी, जब परंपरागत रूप से बुलंद दरवाजे पर उर्स का झंडा शान और अकीदत के साथ चढ़ाया जाएगा। यह ऐतिहासिक रस्म शाम साढ़े चार बजे अदा की जाएगी। झंडा लेकर आने वाला भीलवाड़ा का गौरी परिवार अजमेर पहुंच चुका है और दरगाह परिसर में रौनक बढ़ गई है।
उर्स कन्वीनर हाजी सैय्यद हसन हाशमी ने बताया कि हर साल जमादिल आखिर महीने की 25 तारीख को गरीब नवाज के उर्स का झंडा बुलंद दरवाजे पर चढ़ाया जाता है। इसी रस्म के साथ उर्स की अनौपचारिक शुरुआत मानी जाती है। 17 दिसंबर को अस्र की नमाज के बाद परंपरागत जुलूस रवाना होगा, जिसमें गाजे-बाजे, ढोल-ताशे और सूफियाना कलाम के साथ झंडा दरगाह तक लाया जाएगा। बड़े पीर की पहाड़ी से तोप के गोले दागे जाएंगे, जो इस ऐतिहासिक मौके की भव्यता को और बढ़ाएंगे।
उर्स की विधिवत शुरुआत रजब का चांद दिखाई देने पर होगी। यदि 21 दिसंबर को चांद नजर आता है तो उसी रात से उर्स की रस्में शुरू होंगी, अन्यथा 22 दिसंबर की रात से उर्स मनाया जाएगा। चांद रात यानी 21 दिसंबर को दरगाह का जन्नती दरवाजा जायरीन की जियारत के लिए खोला जाएगा। उर्स के दौरान यह दरवाजा सबसे ज्यादा छह दिनों तक खुला रहता है, जिससे देश-विदेश से आने वाले लाखों जायरीन जन्नती दरवाजे से जियारत कर सकें।
महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की मजार पर सालभर चढ़ाया जाने वाला संदल 20 दिसंबर को उतारा जाएगा। यह रस्म खुद्दाम-ए-ख्वाजा द्वारा अदा की जाएगी। 17 दिसंबर को सुबह आस्ताना शरीफ खोले जाने के साथ ही उर्स से जुड़ी धार्मिक गतिविधियां शुरू हो जाएंगी। उर्स के दौरान रोजाना मजार शरीफ की खिदमत होगी और 21 से 28 दिसंबर तक सुबह चार बजे आस्ताना शरीफ खोल दिया जाएगा, ताकि जायरीन आसानी से जियारत कर सकें।
जन्नती दरवाजा साल में चार बार खोला जाता है, लेकिन उर्स के मौके पर इसका विशेष महत्व होता है। उर्स के अलावा ईद-उल-फितर, बकरा ईद और ख्वाजा साहब के गुरु हजरत उस्मान हारूनी के सालाना उर्स के अवसर पर यह दरवाजा एक-एक दिन के लिए खोला जाता है। परंपरा के अनुसार उर्स में आने वाले जायरीन के लिए जन्नती दरवाजा कुल की रस्म के बाद 6 रजब को बंद कर दिया जाता है। जन्नती दरवाजे पर सालभर जायरीन मन्नत का धागा बांधते हैं और दरवाजा खुलते ही जायरीन की संख्या में जबरदस्त इजाफा हो जाता है।
इस ऐतिहासिक रस्म को निभाने का गौरव भीलवाड़ा के गौरी परिवार को हासिल है, जो पिछले 82 वर्षों से लगातार झंडा चढ़ाने की परंपरा निभा रहा है। इस रस्म की शुरुआत 1928 में पेशावर के हजरत सैयद अब्दुल सत्तार बादशाह जान रहमतुल्लाह अलैह ने की थी। वर्ष 1944 से भीलवाड़ा के लाल मोहम्मद गौरी के परिवार ने यह जिम्मेदारी संभाली। लाल मोहम्मद गौरी ने 1991 तक, उनके बाद मोइनुद्दीन गौरी ने 2006 तक और अब फखरुद्दीन गौरी इस रस्म को अदा कर रहे हैं।
उर्स के दौरान प्रशासन ने व्यवस्था और सुरक्षा को लेकर भी खास इंतजाम किए हैं। अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट नरेन्द्र कुमार मीणा ने बताया कि जायरीन अपनी चादरें ढोल-ताशे और बैंड-बाजे के साथ देहली गेट तक ही ले जा सकेंगे। देहली गेट के बाद जुलूस, ढोल-ताशे और बैंड के साथ चादरें ले जाने की अनुमति नहीं होगी, ताकि भीड़ और जाम की समस्या से बचा जा सके।
सुरक्षा के लिहाज से 814वें उर्स में पांच हजार से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किए जाएंगे। इसके अलावा सीबी, सीआईडी, डीएसटी, एसआईटी सहित अन्य खुफिया एजेंसियां भी सक्रिय रहेंगी। उर्स के दौरान हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जाएगी।
इस बीच उर्स से जुड़ा एक और बड़ा रिकॉर्ड सामने आया है। दरगाह में स्थित दोनों देगों का 15 दिन का ठेका इस बार रिकॉर्ड 3.40 करोड़ रुपए से अधिक में छोड़ा गया है। करीब 14 घंटे तक चली बोली के बाद यह ठेका दिया गया। पिछले साल 813वें उर्स में देगों का ठेका 2 करोड़ 68 लाख रुपए में छोड़ा गया था। इस बार करीब 72 लाख रुपए अधिक में ठेका छूटा है, जिसकी शुरुआत 17 दिसंबर से होगी।
कुल मिलाकर, ख्वाजा गरीब नवाज के 814वें उर्स को लेकर अजमेर में धार्मिक आस्था, परंपरा, सुरक्षा और व्यवस्थाओं का अनूठा संगम देखने को मिलेगा, जहां लाखों जायरीन अमन, सुकून और भाईचारे का पैगाम लेकर दरगाह पहुंचेंगे।


