पश्चिम मध्य रेलवे के कोटा मंडल ने रेलवे आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। देश का पहला स्वचालित लोको धुलाई प्लांट कोटा मंडल के टीकेडी विद्युत लोको शेड में स्थापित किया गया है। यह परियोजना न केवल तकनीकी उन्नयन का उदाहरण है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी एक प्रभावी कदम मानी जा रही है।
इस अत्याधुनिक प्लांट का सफल परीक्षण हाल ही में किया गया, जिसमें दो विद्युत इंजनों की धुलाई कर इसकी कार्यक्षमता और गुणवत्ता को परखा गया। परीक्षण के दौरान मशीनों की गति, जल उपयोग, ब्रशिंग प्रणाली और अपशिष्ट प्रबंधन की जांच की गई। अधिकारियों के अनुसार प्लांट का विधिवत कमीशनिंग कार्य शीघ्र ही पूरा कर लिया जाएगा, जिसके बाद यह नियमित संचालन में आ जाएगा।
1.74 करोड़ की लागत से विकसित परियोजना
पश्चिम मध्य रेलवे के अंतर्गत स्थापित इस परियोजना को लगभग 1.74 करोड़ रुपये की लागत से विकसित किया गया है। यह निवेश रेलवे के बुनियादी ढांचे को आधुनिक और कुशल बनाने की दिशा में एक ठोस प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक एवं जनसंपर्क अधिकारी सौरभ जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि यह प्लांट अत्यंत प्रभावी परिचालन क्षमता रखता है। नई तकनीक के कारण एक इंजन की धुलाई में अधिकतम 10 मिनट का समय लगता है, जो पारंपरिक मैनुअल प्रक्रिया की तुलना में काफी तेज और सुरक्षित है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार प्रतिदिन कम से कम 25 इंजनों की धुलाई संभव है, जिससे परिचालन दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
जल संरक्षण पर विशेष जोर
इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जल संरक्षण है। प्रति इंजन धुलाई में अधिकतम 350 लीटर ताजे जल का उपयोग किया जाता है, जो कि इस तरह की भारी मशीनरी की सफाई के लिए अत्यंत संतुलित मात्रा मानी जाती है।
इसके साथ ही इस्तेमाल किए गए जल का 75 से 80 प्रतिशत तक पुनर्चक्रण किया जाता है। इस उद्देश्य से 20,000 लीटर क्षमता की भूमिगत जल भंडारण टंकी स्थापित की गई है। इसके अतिरिक्त 10,000-10,000 लीटर क्षमता के सॉफ्ट वाटर टैंक और पुनर्चक्रित जल टैंक भी लगाए गए हैं। इन टैंकों की मदद से जल को संग्रहित, शुद्ध और पुनः उपयोग किया जाता है, जिससे ताजे पानी की खपत में भारी कमी आती है।
रेलवे प्रशासन का मानना है कि इस तरह की जल प्रबंधन प्रणाली भविष्य में अन्य मंडलों के लिए भी एक मॉडल के रूप में काम कर सकती है।
अत्याधुनिक तकनीक से लैस प्रणाली
लोको धुलाई प्लांट को पूरी तरह स्वचालित और वैज्ञानिक प्रणाली के अनुरूप तैयार किया गया है। इसमें डिटर्जेंट यूनिट, ब्रशिंग यूनिट और वॉश-ऑफ यूनिट जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं शामिल हैं। डिटर्जेंट यूनिट नियंत्रित मात्रा में सफाई द्रव्य का छिड़काव करती है, जबकि ब्रशिंग यूनिट इंजन की सतह को समान रूप से साफ करती है। इसके बाद वॉश-ऑफ यूनिट उच्च दबाव से जल का उपयोग कर अंतिम सफाई सुनिश्चित करती है।
जल शोधन और अपशिष्ट जल शोधन की भी विशेष व्यवस्था की गई है। जल शोधन के लिए 200 लीटर क्षमता की रेजिन टंकी स्थापित की गई है, जिससे पानी को सॉफ्ट बनाकर पुनः उपयोग योग्य बनाया जाता है। वहीं अपशिष्ट जल शोधन के लिए 200 लीटर क्षमता की रासायनिक टंकी लगाई गई है, जो गंदे पानी को पर्यावरण मानकों के अनुरूप साफ करती है। इस प्रक्रिया से सुनिश्चित होता है कि प्लांट की पूरी कार्यप्रणाली पर्यावरण-अनुकूल रहे।
पर्यावरण और दक्षता की दिशा में बड़ा कदम
भारतीय रेलवे लगातार अपने संचालन में आधुनिक तकनीक और हरित पहल को शामिल कर रहा है। कोटा मंडल में स्थापित यह स्वचालित लोको धुलाई प्लांट उसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इससे न केवल समय और श्रम की बचत होगी, बल्कि जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य भी सुदृढ़ होंगे।
पारंपरिक धुलाई प्रणाली में जहां अधिक समय और अधिक जल की आवश्यकता होती थी, वहीं यह स्वचालित प्रणाली सीमित संसाधनों में बेहतर परिणाम देने में सक्षम है। इससे इंजनों की नियमित सफाई सुनिश्चित होगी, जो दीर्घकालिक रूप से उनकी कार्यक्षमता और जीवनकाल को भी बढ़ाएगी।
अन्य मंडलों के लिए मॉडल बनेगा कोटा
रेलवे अधिकारियों का मानना है कि कोटा मंडल का यह प्रोजेक्ट भविष्य में देश के अन्य रेलवे मंडलों के लिए एक आदर्श मॉडल साबित हो सकता है। यदि यह प्लांट अपने निर्धारित मानकों के अनुरूप सफल संचालन करता है, तो अन्य प्रमुख लोको शेड में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू की जा सकती है।


