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खाना पकाने के तेल से उड़ेंगे विमान: इंडियन ऑयल को मिला SAF बनाने का सर्टिफिकेशन

खाना पकाने के तेल से उड़ेंगे विमान: इंडियन ऑयल को मिला SAF बनाने का सर्टिफिकेशन

मनीषा शर्मा।  भारत अब हरी ऊर्जा (Green Energy) की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। घरेलू और औद्योगिक स्तर पर फेंक दिए जाने वाले खाने के तेल से अब विमान उड़ान भर सकेंगे। यह सुनने में भले ही असामान्य लगे, लेकिन इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) ने इसे हकीकत में बदल दिया है। हरियाणा के पानीपत स्थित IOC की रिफाइनरी को अंतरराष्ट्रीय नागर विमानन संगठन (ICAO) से इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल से सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) बनाने का ISCC CORSIA सर्टिफिकेशन मिल गया है। यह उपलब्धि केवल इंडियन ऑयल ही नहीं बल्कि भारत के लिए भी ऐतिहासिक है, क्योंकि यह कंपनी देश की पहली ऐसी इकाई बनी है जिसने इस तरह का प्रमाणन हासिल किया है।

क्या है सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF)?

सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल या SAF एक वैकल्पिक ईंधन है जो नॉन-पेट्रोलियम फीडस्टॉक जैसे इस्तेमाल किए गए खाना पकाने के तेल से बनाया जाता है। इसे पारंपरिक एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF या जेट फ्यूल) में 50% तक मिलाया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह विमानन क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को काफी हद तक कम करता है। भारत सरकार ने 2027 से अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन कंपनियों को बेचे जाने वाले जेट फ्यूल में कम से कम 1% SAF ब्लेंडिंग अनिवार्य कर दी है। यह कदम कार्बन फुटप्रिंट घटाने और क्लीन एनर्जी को बढ़ावा देने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

2025 से शुरू होगा बड़े पैमाने पर उत्पादन

IOC के चेयरमैन अरविंदर सिंह साहनी ने जानकारी दी कि पानीपत रिफाइनरी इस साल के अंत से SAF का उत्पादन शुरू कर देगी। शुरुआती क्षमता सालाना 35,000 टन होगी, जो 2027 में 1% ब्लेंडिंग की अनिवार्यता को पूरा करने के लिए पर्याप्त मानी जा रही है।

खाना पकाने का तेल कैसे बनेगा ईंधन?

भारत में बड़े होटल, रेस्तरां और स्नैक्स इंडस्ट्री जैसे हल्दीराम जैसी कंपनियां हर दिन बड़ी मात्रा में तेल का उपयोग करती हैं। एक बार फ्राई करने के बाद यह तेल बेकार मानकर फेंक दिया जाता है। फिलहाल, इस तेल को एजेंसियां इकट्ठा करके निर्यात करती हैं। लेकिन अब इसी तेल को पानीपत रिफाइनरी में भेजा जाएगा, जहां इसे SAF बनाने के लिए प्रोसेस किया जाएगा। साहनी के अनुसार, भारत में इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल की उपलब्धता काफी अधिक है। चुनौती केवल इसे व्यवस्थित तरीके से इकट्ठा करने की है। बड़ी होटल चेन्स से इसे जुटाना आसान है, लेकिन घरेलू स्तर पर छोटे उपयोगकर्ताओं से यह तेल इकट्ठा करना अभी भी एक मुश्किल काम है।

ग्रीन एनर्जी की दिशा में IOC का कदम

इंडियन ऑयल सिर्फ SAF तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रीन एनर्जी के अन्य क्षेत्रों में भी अग्रणी भूमिका निभा रही है। कंपनी वर्तमान में 2G एथेनॉल, फ्यूल सेल, बायो-डीजल और एनर्जी स्टोरेज डिवाइसेज पर भी काम कर रही है। इसके साथ ही, पानीपत रिफाइनरी में देश का सबसे बड़ा ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट स्थापित किया जा रहा है। इस प्लांट की सालाना क्षमता 10,000 टन होगी और इसे अगले 27 महीनों में तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। ग्रीन हाइड्रोजन पानी को नवीकरणीय ऊर्जा के जरिए विभाजित करके बनाई जाती है। यह पूरी तरह क्लीन एनर्जी है, क्योंकि इससे केवल जलवाष्प उत्सर्जित होता है और यह कोयला या तेल की तरह प्रदूषण नहीं फैलाता।

ब्यूटाइल एक्रिलेट प्लांट से पेंट उद्योग को मजबूती

IOC ने गुजरात की कोयाली रिफाइनरी में 5,000 करोड़ रुपये की लागत से ब्यूटाइल एक्रिलेट (Butyl Acrylate) प्लांट भी स्थापित किया है। इसका उपयोग पेंट बनाने में होता है। इस प्लांट की सालाना क्षमता डेढ़ लाख टन है और यह देश में वर्तमान में आयात किए जाने वाले 3,20,000 टन पेंट फीडस्टॉक को काफी हद तक कम कर देगा। कोच्चि में बीपीसीएल की इकाई के बाद यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा ब्यूटाइल एक्रिलेट प्लांट है। इसके चालू होने से भारत की विदेशी मुद्रा की बचत होगी और आत्मनिर्भर भारत (Atmanirbhar Bharat) अभियान को भी मजबूती मिलेगी।

भारत के लिए क्या मायने रखता है यह बदलाव?

भारत की पेंट इंडस्ट्री 13-14% की दर से हर साल बढ़ रही है और विमानन क्षेत्र भी तेजी से विस्तार कर रहा है। ऐसे में घरेलू स्तर पर वैकल्पिक ईंधन और कच्चे माल का उत्पादन करना न केवल आयात पर निर्भरता घटाएगा, बल्कि देश को ग्रीन एनर्जी और सस्टेनेबल सॉल्यूशंस में विश्वस्तरीय पहचान भी दिलाएगा। इंडियन ऑयल का यह कदम भारत को क्लीन एनर्जी की दौड़ में अग्रणी बनाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगा।

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