राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे ने कहा है कि शिक्षा की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब उसका उपयोग राष्ट्र के उत्थान और व्यक्ति के सर्वांगीण निर्माण के लिए किया जाए। वे गुरुवार को वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के 18वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने विश्वविद्यालय के विभिन्न पाठ्यक्रमों में उत्तीर्ण 75 हजार 925 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान कीं, जिनमें तीन पीएचडी उपाधियां भी शामिल रहीं। दीक्षांत समारोह में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शिक्षकगण और अभिभावक उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान शिक्षा, संस्कार और राष्ट्र निर्माण के विषय पर विचार व्यक्त किए गए, जिससे समारोह को वैचारिक गहराई मिली।
बागडे ने किया दीक्षित विद्यार्थियों को राष्ट्र सर्वोपरि की भावना से कार्य करने का आह्वान
राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने दीक्षा प्राप्त विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपनी डिग्री और अर्जित ज्ञान का उपयोग केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित न रखें, बल्कि अपनी बौद्धिक क्षमताओं के विस्तार और प्रतिभाओं के निखार के माध्यम से राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर कार्य करें। उन्होंने देव और दानव संस्कृति का उदाहरण देते हुए कहा कि मानव जीवन में यह तय करना आवश्यक है कि हम अपनी शिक्षा और शक्ति का उपयोग समाज को आगे बढ़ाने के लिए करें या केवल स्वार्थ सिद्धि के लिए। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे एक-दूसरे को आगे बढ़ाने की मानसिकता अपनाएं और विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में अपनी भूमिका निभाएं।
भारत को विश्वगुरु बनाने में युवाओं की भूमिका
राज्यपाल ने कहा कि भारत को पुनः विश्वगुरु की पद प्रतिष्ठा दिलाने में युवा वर्ग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने तैत्तिरीय उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद के विचारों का उल्लेख करते हुए गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में केवल अध्ययन ही नहीं, बल्कि गुरु और ज्ञान के प्रति श्रद्धा, समर्पण और अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है। भारतीय शिक्षा परंपरा में गुरु का स्थान सर्वोच्च रहा है और उसी परंपरा को जीवित रखना आज के समय की आवश्यकता है।
शिक्षक की भूमिका और सतत अध्ययन पर जोर
कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे ने शिक्षक की भूमिका पर भी विशेष रूप से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार विद्यार्थी के लिए शिक्षा एक सतत प्रक्रिया है, उसी प्रकार शिक्षक के लिए भी निरंतर अध्ययन और ज्ञान अर्जन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शिक्षक को अपने शिष्यों के साथ संतानवत् भाव रखना चाहिए और उनके भविष्य की चिंता उसी प्रकार करनी चाहिए, जैसे कोई अभिभावक अपनी संतान के लिए करता है। शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों और जीवन मूल्यों का संचरण करना भी शिक्षक का दायित्व है, ताकि विद्यार्थी न केवल शिक्षित और कुशल बनें, बल्कि चारित्रिक और नैतिक मूल्यों से भी संपन्न हों।
उपमुख्यमंत्री ने युवाओं को विकसित भारत की नींव बताया
उपमुख्यमंत्री एवं उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा ने दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि दीक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी विकसित भारत की नींव के मजबूत स्तंभ हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे जिस भी क्षेत्र में कार्य करें, वहां ईमानदारी को अपना आभूषण, कर्तव्य को अपना धर्म और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा के विस्तार से प्रदेश के युवा ज्ञान और कौशल में दक्ष बनेंगे, जिससे वे जिम्मेदार नागरिक, समाज के मार्गदर्शक और भविष्य के निर्माता बन सकेंगे।
शिक्षा को सेवा की प्रेरणा बनाने का संदेश
सार्वजनिक निर्माण विभाग तथा महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री प्रो. मंजू बाघमार ने कहा कि दीक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी भारत की आशाओं के प्रतिनिधि हैं और उनकी डिग्री राष्ट्र का विश्वास है। उन्होंने युवा शक्ति से आह्वान किया कि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें और शिक्षा को केवल सुविधा नहीं, बल्कि सेवा की प्रेरणा बनाएं। उन्होंने कहा कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करते हुए विकास के पथ पर आगे बढ़ना ही सच्चा राष्ट्र निर्माण है। युवाओं को चाहिए कि वे अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग समाज और देश की भलाई के लिए करें।
दीक्षांत भाषण और समारोह का समापन
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. उमा कांजीलाल ने दीक्षांत भाषण दिया। उन्होंने मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्रणाली उन विद्यार्थियों के लिए वरदान है, जो विभिन्न कारणों से औपचारिक शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।


