शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर लंबे समय से चली आ रही असमंजस की स्थिति आखिरकार समाप्त हो गई है। शिक्षा मंत्रालय ने लोकसभा में यह स्पष्ट कर दिया है कि टीईटी न केवल नए शिक्षकों की भर्ती के लिए अनिवार्य है, बल्कि सेवारत शिक्षकों की पदोन्नति के लिए भी यह न्यूनतम योग्यता मानी जाएगी। यह निर्णय देशभर में लाखों शिक्षकों को प्रभावित करने वाला है, विशेष रूप से उन शिक्षकों को जो वर्ष 2011 से पहले नियुक्त किए गए थे और अब तक टीईटी से मुक्त समझे जाते रहे थे।
लोकसभा में उठा सवाल, सरकार ने दिया सीधा जवाब
लोकसभा में सांसद लालजी वर्मा ने यह प्रश्न उठाया कि क्या वर्ष 2011 से पहले नियुक्त हुए शिक्षक टीईटी न होने के कारण अनिश्चितता और प्रशासनिक अड़चनों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या केंद्र सरकार ऐसे शिक्षकों के लिए समान नीति बनाते हुए टीईटी से पूर्ण छूट देने पर विचार कर रही है। इस प्रश्न पर शिक्षा मंत्रालय ने साफ शब्दों में उत्तर दिया कि टीईटी से छूट देने जैसी कोई भी राष्ट्रीय नीति फिलहाल विचाराधीन नहीं है और टीईटी की अनिवार्यता सभी शिक्षकों पर समान रूप से लागू होगी।
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय ने 1 सितंबर 2025 के अपने आदेश में यह घोषित किया है कि आरटीई अधिनियम के तहत आने वाले किसी भी स्कूल में शिक्षक नियुक्ति के लिए टीईटी न्यूनतम अनिवार्य योग्यता है। इस निर्णय के बाद सरकार के पास किसी भी समूह के शिक्षकों को टीईटी से छूट देने की कोई वैधानिक संभावना नहीं बचती, इसलिए टीईटी को हर स्तर पर लागू करना आवश्यक है।
2011 से पहले के शिक्षकों के लिए नई व्यवस्था: टीईटी अब अनिवार्य शर्त
शिक्षा मंत्रालय ने यह घोषणा की कि वर्ष 2011 से पहले नियुक्त शिक्षक भी अब अनिवार्य रूप से टीईटी उत्तीर्ण करेंगे। बिना टीईटी पास किए किसी भी शिक्षक को पदोन्नति का लाभ नहीं दिया जाएगा और उच्च पदों तक पहुंचने का रास्ता स्वतः बंद हो जाएगा। यह निर्णय उन हजारों शिक्षकों के लिए बड़ा बदलाव है, जिन्हें अब तक छूट प्राप्त रहे होने का विश्वास था।
मंत्रालय ने सेवा अवधि के अनुसार दो श्रेणियों में व्यवस्था लागू की है। जिन शिक्षकों की नौकरी में पांच वर्ष से अधिक समय शेष है, उन्हें 1 सितंबर 2025 से शुरू होने वाले दो वर्ष की अवधि में टीईटी पास करना अनिवार्य होगा। यदि वे निर्धारित समय सीमा में परीक्षा पास नहीं करते, तो वे सेवा में बने नहीं रह सकेंगे। वहीं जिन शिक्षकों की सेवा अवधि पांच वर्ष से कम बची है, उन्हें बिना टीईटी के सेवानिवृत्ति तक सेवा जारी रखने की अनुमति दी गई है। लेकिन इन शिक्षकों को बिना टीईटी के किसी भी स्थिति में पदोन्नति या उच्च वेतनमान का लाभ नहीं मिलेगा। इस प्रकार मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि टीईटी केवल भर्ती की शर्त नहीं, बल्कि कैरियर प्रगति का आधार भी होगा।
पदोन्नति के लिए भी TET अनिवार्य, नियमों में नहीं होगी कोई ढील
शिक्षा मंत्रालय ने यह दोहराया कि शिक्षक पद पर सीधी नियुक्ति ही नहीं, बल्कि पदोन्नति के माध्यम से उच्च पदों पर जाने के लिए भी टीईटी आवश्यक है। मंत्रालय के अनुसार, शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों के सीखने के स्तर में सुधार के लिए शिक्षकों की योग्यता से समझौता करना संभव नहीं है। इसीलिए टीईटी को न्यूनतम योग्यता मानते हुए इसे हर स्तर पर लागू करना अनिवार्य किया गया है।
यह निर्णय शिक्षा प्रणाली को एक समानता प्रदान करेगा, क्योंकि अब हर शिक्षक को समान योग्यता मानदंड के आधार पर आंका जाएगा। मंत्रालय के अनुसार, इससे शिक्षकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, दक्षता में सुधार होगा और स्कूलों में शिक्षण की गुणवत्ता भी मजबूत होगी।
पुराने शिक्षकों के लिए चुनौती, पर शिक्षा गुणवत्ता के लिए अहम कदम
टीईटी अनिवार्यता को शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ गुणवत्ता सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं। उनका कहना है कि एक ऐसे समय में जब शिक्षण स्तर को सुधारने की मांग लगातार उठ रही है, टीईटी जैसी परीक्षा यह सुनिश्चित करेगी कि शिक्षक अद्यतन ज्ञान रखते हों और नए शैक्षणिक मानकों के अनुरूप बच्चों को पढ़ा सकें।
हालांकि, इस नई व्यवस्था से पुराने शिक्षकों में असमंजस और चिंता की स्थिति भी पैदा हुई है। विशेष रूप से वे शिक्षक जो वर्षों से सेवा दे रहे हैं और अब कैरियर के अंतिम चरण में हैं, उन्हें परीक्षा के दबाव का सामना करना पड़ेगा। राजस्थान शिक्षक संघ रेसटा के प्रदेशाध्यक्ष मोहर सिंह सलावद ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर वर्ष 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से छूट देने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐसे शिक्षकों में से कई लंबे समय से पठन-पाठन कर रहे हैं, इसलिए उन्हें ओरिएंटेशन कोर्स या प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से अद्यतन किया जा सकता है, न कि अनिवार्य परीक्षा के माध्यम से। उनके अनुसार, वरिष्ठ शिक्षकों के पदोन्नति अधिकारों को रोकना उनके कैरियर और परिवारों पर प्रतिकूल असर डालेगा।
शिक्षा मंत्रालय का सख्त संदेश, गुणवत्ता से समझौता नहीं
टीईटी अनिवार्यता को लेकर केंद्र सरकार का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। मंत्रालय मानता है कि शिक्षण की गुणवत्ता सुधारने के लिए कोई भी ढील देना उचित नहीं होगा। इसलिए नए और पुराने सभी शिक्षकों पर समान शर्तें लागू होंगी। यह निर्णय जहां शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, वहीं पुराने शिक्षकों के लिए यह चुनौतीपूर्ण भी साबित हो सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार शिक्षकों की मांगों और गुणवत्ता सुधार के बीच संतुलन कैसे बनाती है।


