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होर्मुज पर तनाव: अमेरिका की नाकेबंदी से चीन-ईरान समीकरण बदलने के आसार

होर्मुज पर तनाव: अमेरिका की नाकेबंदी से चीन-ईरान समीकरण बदलने के आसार

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के केंद्र में आ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत विफल होने के बाद हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप  की ओर से होर्मुज पर संभावित नाकेबंदी के संकेत ने इस पूरे क्षेत्र में भू-राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है। हालांकि इस रणनीति का उद्देश्य ईरान पर आर्थिक दबाव बनाना है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकते हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि अमेरिका इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही को नियंत्रित करने या रोकने की कोशिश करता है, तो इसका सीधा असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। ईरान की आय का बड़ा हिस्सा तेल और गैस निर्यात से आता है और अनुमान है कि अगर उसकी ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है, तो उसे प्रतिदिन लगभग 276 मिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। यह स्थिति ईरान की आर्थिक स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।

अमेरिकी रणनीति के दो अलग-अलग पहलू सामने आए हैं। एक ओर अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड यानी सेंटकॉम का कहना है कि अमेरिकी नौसेना उन जहाजों को रोकेगी जो ईरान से तेल लेकर आ रहे हैं या वहां जाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर ट्रंप का रुख और अधिक आक्रामक नजर आता है, जिसमें वे होर्मुज से गुजरने वाले हर उस जहाज को रोकने की बात कर रहे हैं जो किसी भी रूप में ईरान को आर्थिक लाभ पहुंचा सकता है। इन दोनों रणनीतियों का उद्देश्य भले ही समान हो, लेकिन इनके क्रियान्वयन के तरीके अलग-अलग हैं।

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा प्रभाव चीन पर पड़ सकता है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक है और उसकी तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए ही आता है। आंकड़ों के अनुसार, चीन के कुल तेल आयात का लगभग 45 से 50 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है, जबकि गैस आपूर्ति का करीब 30 प्रतिशत भी इसी रास्ते पर निर्भर है। ऐसे में यदि इस मार्ग पर किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा खतरा पैदा हो सकता है।

चीन के रक्षा मंत्री डोंग जून का हालिया बयान इस स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य फिलहाल खुला है और चीन के जहाज लगातार इस मार्ग से गुजर रहे हैं। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि चीन अपने ऊर्जा और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है। यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के लिए चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

चीन की ऊर्जा जरूरतें केवल ईरान तक सीमित नहीं हैं। वह सऊदी अरब, इराक, यूएई और कतर जैसे देशों से भी बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदता है, लेकिन इन सभी देशों से आने वाली आपूर्ति का प्रमुख मार्ग होर्मुज ही है। ऐसे में इस जलडमरूमध्य पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण या संघर्ष पूरे वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि चीन के पास वैकल्पिक स्रोत भी मौजूद हैं, जैसे रूस से आने वाली ईएसपीओ पाइपलाइन और ‘पावर ऑफ साइबेरिया’ गैस पाइपलाइन, लेकिन ये विकल्प पूरी तरह से होर्मुज के विकल्प नहीं बन सकते। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है, तो चीन को भी ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में संभावना है कि चीन इस स्थिति में सक्रिय भूमिका निभाए और होर्मुज को खुला रखने के लिए कूटनीतिक या सैन्य कदम उठाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विवाद में चीन की सीधी एंट्री होती है, तो यह केवल अमेरिका और ईरान के बीच का मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि एक बड़े वैश्विक संघर्ष का रूप ले सकता है। वर्तमान में अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यदि चीन भी इस समीकरण में शामिल हो जाता है, तो शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

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