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जोजरी नदी प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

जोजरी नदी प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

राजस्थान के जोधपुर जिले में जोजरी-लूनी नदी तंत्र में फैल रहे गंभीर प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में मौखिक रूप से बड़ा आदेश देते हुए जोधपुर के औद्योगिक क्षेत्रों से जुड़े कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट यानी सीईटीपी और उससे संबद्ध 306 वस्त्र उद्योग इकाइयों को अगली जांच और सुधारात्मक कार्रवाई पूरी होने तक बंद रखने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह टिप्पणी उस समय की जब जोजरी नदी में बिना उपचारित जहरीला औद्योगिक पानी छोड़े जाने के लिए इस्तेमाल की जा रही करीब चार किलोमीटर लंबी अवैध भूमिगत पाइपलाइन का खुलासा हुआ।

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने इस पूरे मामले को बेहद गंभीर मानते हुए राजस्थान सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित औद्योगिक इकाइयों की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए। न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायाधीश संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि इतनी बड़ी अवैध डिस्चार्ज व्यवस्था लंबे समय तक बिना अधिकारियों की जानकारी के कैसे संचालित होती रही। अदालत ने यह भी पूछा कि जब नदी क्षेत्र की निगरानी की जिम्मेदारी प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों के पास थी, तब आखिर स्थानीय अधिकारी क्या कर रहे थे।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषित पानी को ट्रीटमेंट प्रक्रिया से गुजारे बिना सीधे नदी तंत्र में छोड़ा जा रहा था। अदालत ने माना कि यह केवल पर्यावरणीय उल्लंघन का मामला नहीं है, बल्कि इससे हजारों लोगों के स्वास्थ्य, कृषि भूमि, भूजल और पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवमंगल शर्मा ने अदालत को बताया कि 27 मई को निरीक्षण समिति द्वारा अवैध डिस्चार्ज पाइपलाइन का पता चलते ही तत्काल कार्रवाई शुरू कर दी गई थी। उन्होंने कहा कि जयपुर से विशेष टीम को तुरंत जोधपुर भेजा गया और मामले की जांच तेज की गई। सरकार ने प्राथमिक स्तर पर जिम्मेदारी तय करते हुए राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दो अधिकारियों को निलंबित किया है, जबकि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला भी किया गया है।

सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार रीजनल ऑफिसर कामिनी सोनगरा को एपीओ किया गया है, जबकि लैब इंचार्ज देवेंद्र सिंह और सहायक पर्यावरण अभियंता कुणाल खत्री को सस्पेंड कर दिया गया है। इसके साथ ही पूरे मामले में आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की प्रक्रिया भी आरंभ कर दी गई है।

राज्य सरकार ने अदालत को यह भरोसा भी दिलाया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की निगरानी में विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया जाएगा। यह एसआईटी औद्योगिक इकाइयों, सीईटीपी प्रबंधन और सरकारी अधिकारियों की भूमिका की विस्तृत जांच करेगी। अदालत में सरकार ने कहा कि पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के प्रति उसकी “जीरो टॉलरेंस” नीति है और राजस्थान की नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाना उसका कानूनी और नैतिक दायित्व है।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल की अध्यक्ष अपर्णा अरोड़ा ने भी अदालत को आश्वस्त किया कि अवैध औद्योगिक गतिविधियों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मामले की जानकारी सामने आते ही विभाग ने त्वरित कार्रवाई शुरू कर दी थी और अब प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया कि केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर मामले को खत्म नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस पूरे नेटवर्क में शामिल हर जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान होनी चाहिए और उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि इतने बड़े स्तर पर अवैध पाइपलाइन बिछाई गई और उसका उपयोग लंबे समय तक होता रहा, तो इसमें कई स्तरों पर मिलीभगत की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने निरीक्षण समितियों की रिपोर्टों का भी संज्ञान लिया, जिनमें जोजरी-बांडी-लूनी नदी तंत्र में अत्यधिक प्रदूषण की स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई थी। रिपोर्टों में बताया गया कि नदी तल में बड़ी मात्रा में विषैला स्लज जमा हो चुका है, जो मानसून के दौरान आसपास के क्षेत्रों में और अधिक फैल सकता है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि समय रहते इस जहरीले कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण नहीं किया गया, तो इसका असर कृषि भूमि, भूजल स्रोतों और स्थानीय पर्यावरण पर लंबे समय तक दिखाई देगा।

विशेषज्ञों के अनुसार जोजरी और लूनी नदी क्षेत्र पहले से ही औद्योगिक प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है। कई वर्षों से स्थानीय लोग और पर्यावरण कार्यकर्ता इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। आरोप लगाया जाता रहा है कि कुछ औद्योगिक इकाइयां नियमों की अनदेखी करते हुए बिना उचित उपचार के रासायनिक अपशिष्ट नदी में छोड़ रही हैं। इससे नदी का पानी जहरीला होता गया और आसपास के क्षेत्रों में खेती तथा पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। अदालत का मानना है कि केवल अस्थायी कार्रवाई से समस्या का समाधान संभव नहीं है, बल्कि स्थायी और वैज्ञानिक व्यवस्था विकसित करनी होगी ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों।

फिलहाल अदालत के निर्देशों के बाद जोधपुर के औद्योगिक क्षेत्र में हलचल तेज हो गई है। 306 वस्त्र उद्योग इकाइयों और सीईटीपी के बंद होने से उद्योग जगत में चिंता का माहौल है, वहीं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का स्वागत किया है। अब सभी की नजर राज्य सरकार की अगली कार्रवाई, एसआईटी जांच और सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी होने वाले विस्तृत आदेशों पर टिकी हुई है।

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