मनीषा शर्मा। पूर्व राज्य मंत्री सुखराम बिश्नोई ने सांचौर जिले को निरस्त न करने की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया है। बुधवार को सांचौर कलेक्ट्रेट के सामने जिला बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले उनका यह अनशन शुरू हुआ। उनका कहना है कि जब तक सरकार सांचौर जिले के निरस्तीकरण के मुद्दे पर स्पष्ट घोषणा नहीं कर देती, तब तक उनका आमरण अनशन जारी रहेगा।
एसपी ट्रांसफर के बाद निरस्तीकरण का डर
बिश्नोई ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि हाल ही में आई IPS ट्रांसफर लिस्ट में सांचौर एसपी को हटाकर जालोर के एसपी को सांचौर का अतिरिक्त चार्ज दिया गया है। इस निर्णय से सांचौर की जनता में जिले को निरस्त करने का डर बढ़ गया है। सुखराम बिश्नोई का मानना है कि सांचौर जिले का निरस्तीकरण क्षेत्र के विकास और वहां के लोगों की आवश्यकताओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।
उन्होंने अपनी बात को जोर देते हुए कहा कि सांचौर जिले के लोगों के हितों की रक्षा के लिए यह संघर्ष बेहद महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि वे किसी भी कीमत पर इस जिले को यथावत रखने के लिए संघर्ष करेंगे और राज्य सरकार से अपील करते हैं कि वह जनता की भावनाओं को समझे और सांचौर जिले को निरस्त करने की किसी भी योजना पर विराम लगाए।
अनशन स्थल पर समर्थन
सुखराम बिश्नोई के इस आमरण अनशन को क्षेत्र के प्रमुख लोगों का समर्थन भी मिल रहा है। व्यापार मंडल अध्यक्ष हरीश पुरोहित सीलू, सभापति नरेश सेठ, हिंदू सिंह दूठवा, केशा राम मेहरा, और जगमाला राम बिश्नोई समेत कई प्रमुख लोग अनशन स्थल पर मौजूद रहे। अनशन का यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक सरकार इस मामले में अपना निर्णय स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखती।
सांचौर का रणनीतिक और औद्योगिक महत्व
सांचौर जिला सामरिक और औद्योगिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह जिला नेशनल हाईवे-68 और भारतमाला प्रोजेक्ट से जुड़ा हुआ है, जो इसे व्यापार और यातायात के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाता है। सांचौर मुख्यालय से पाकिस्तान की सीमा केवल 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिससे इसका रणनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है। ऐसे में इस जिले का निरस्तीकरण क्षेत्र की सुरक्षा और आर्थिक विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष का बयान और विवाद
बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ का एक बयान भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा में आया था। उन्होंने 8 सितंबर को भीलवाड़ा में कहा था कि तत्कालीन सरकार ने कई गलत जिले बनाए थे, जिनमें सांचौर और केकड़ी जैसे जिले शामिल थे। उन्होंने कहा था कि ये जिले सिर्फ तुष्टीकरण के लिए बनाए गए हैं और इन्हें हटाया जाएगा।
हालांकि, बाद में राठौड़ ने अपने इस बयान पर यूटर्न लेते हुए कहा था कि “किसी को एक बार कुछ दे दो, फिर उसे वापस लेना कितना मुश्किल होता है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि जनता को चिंता करने की जरूरत नहीं है और इस मामले में पार्टी कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी।
सांचौर जिले का भविष्य
सुखराम बिश्नोई का यह आमरण अनशन सांचौर जिले के भविष्य को लेकर चल रहे विवाद को और भी गर्म कर सकता है। सरकार को अब यह तय करना होगा कि वह इस जिले को बनाए रखती है या निरस्त करती है। जनता के विकास और क्षेत्र की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस निर्णय का प्रभाव दूरगामी हो सकता है।
बिश्नोई का यह अनशन केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन चुका है। उनका यह कदम सांचौर की जनता के हक के लिए उठाया गया एक बड़ा कदम है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है और क्या जनता की भावनाओं का सम्मान करती है।


