राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित राजस्थान यूनिवर्सिटी में आयोजित होने जा रहे 35वें दीक्षांत समारोह से पहले विवाद गहराता नजर आ रहा है। एक ओर जहां यह समारोह विद्यार्थियों के लिए गौरव और उपलब्धि का क्षण होता है, वहीं दूसरी ओर इस बार समारोह से पहले ही छात्रों के विरोध ने माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है। कार्यक्रम में देश के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, राज्यपाल और उच्च शिक्षा मंत्री की मौजूदगी इसे और अधिक महत्वपूर्ण बना रही है, लेकिन इसी बीच पीएचडी छात्रों के विरोध ने प्रशासन के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।
विवाद की मुख्य वजह विश्वविद्यालय प्रशासन का वह निर्णय है, जिसके तहत इस बार पीएचडी छात्रों को मंच पर बुलाकर डिग्री प्रदान करने का प्रावधान नहीं रखा गया है। छात्रों का कहना है कि वर्षों की मेहनत और शोध के बाद मिलने वाली पीएचडी डिग्री उनके लिए केवल एक प्रमाण पत्र नहीं, बल्कि उनकी शैक्षणिक यात्रा का सबसे बड़ा सम्मान है। ऐसे में उन्हें मंच से सम्मानित न करना उनकी उपलब्धि को कमतर आंकने जैसा है।
इस मुद्दे को लेकर छात्रों ने दीक्षांत समारोह से एक दिन पहले ही विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था। जानकारी के अनुसार 24 अप्रैल की देर शाम छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर में अपनी नाराजगी जाहिर की और प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई। इस दौरान कुछ छात्र नेताओं ने कुलगुरु की गाड़ी का घेराव करने की भी कोशिश की, जिससे माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। छात्रों का कहना है कि यदि उन्हें मंच से डिग्री नहीं दी गई, तो यह उनकी मेहनत और संघर्ष का अपमान होगा।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस प्रशासन को भी सक्रिय होना पड़ा। हंगामे की आशंका को देखते हुए पुलिस ने एनएसयूआई के कुछ प्रमुख छात्र नेताओं को हिरासत में ले लिया। इनमें मनीष मेघवंशी, रामसिंह सामोता और नीरज खीचड़ के नाम सामने आए हैं। इन्हें जयपुर के गांधी नगर थाने में डिटेन किया गया, ताकि दीक्षांत समारोह के दौरान किसी भी तरह की अव्यवस्था को रोका जा सके। पुलिस की इस कार्रवाई से यह साफ संकेत मिलता है कि प्रशासन इस कार्यक्रम को किसी भी स्थिति में शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराना चाहता है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की चिंता का एक बड़ा कारण हाल ही में हुआ एक अन्य घटनाक्रम भी है। हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में आयोजित दीक्षांत समारोह के दौरान भी इसी तरह का विवाद सामने आया था। वहां भी छात्रों को मंच से डिग्री नहीं देने का निर्णय लिया गया था, जिसके विरोध में एक छात्रा ने डिप्टी सीएम के सामने ही अपना विरोध दर्ज कराया था। इस घटना के बाद भारी हंगामा हुआ और अंततः प्रशासन को अपना फैसला बदलते हुए सभी छात्रों को मंच पर बुलाकर सम्मानित करना पड़ा था। इसी तरह की स्थिति से बचने के लिए राजस्थान यूनिवर्सिटी प्रशासन इस बार पहले से सतर्क नजर आ रहा है।
पीएचडी छात्रों और छात्र संगठनों का कहना है कि डिग्री वितरण केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह उनके वर्षों के शोध, परिश्रम और समर्पण का प्रतीक है। उनका मानना है कि जब अन्य डिग्रीधारकों को मंच पर बुलाकर सम्मानित किया जाता है, तो पीएचडी जैसे उच्चतम शैक्षणिक स्तर के छात्रों को इस सम्मान से वंचित करना अनुचित है। छात्र नेताओं ने इस मुद्दे पर सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपनी बात रखी और वीडियो जारी कर इसे ‘डिग्री का अपमान’ बताया।
वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष सामने नहीं आ पाया है कि आखिर इस बार ऐसा निर्णय क्यों लिया गया। हालांकि, यह माना जा रहा है कि कार्यक्रम के समय और व्यवस्थाओं को देखते हुए यह फैसला लिया गया होगा, लेकिन छात्रों के विरोध के बाद अब यह मुद्दा गंभीर रूप ले चुका है।
दीक्षांत समारोह किसी भी विश्वविद्यालय के लिए एक प्रतिष्ठित अवसर होता है, जहां छात्रों को उनके शैक्षणिक सफर की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया जाता है। ऐसे में यदि इस तरह के विवाद सामने आते हैं, तो यह न केवल संस्थान की छवि को प्रभावित करते हैं, बल्कि छात्रों के मनोबल पर भी असर डालते हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि प्रशासन और छात्रों के बीच संवाद की कमी इस विवाद का मुख्य कारण बन रही है।
अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि दीक्षांत समारोह के दौरान स्थिति किस तरह से संभाली जाती है। यदि प्रशासन छात्रों की मांगों पर विचार करता है, तो यह विवाद शांत हो सकता है, अन्यथा यह विरोध और भी बड़ा रूप ले सकता है। कुल मिलाकर, राजस्थान यूनिवर्सिटी का यह दीक्षांत समारोह इस बार केवल शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए ही नहीं, बल्कि छात्र-प्रशासन के टकराव के कारण भी चर्चा में बना हुआ है।


