मनीषा शर्मा। राजस्थान के सरिस्का अभयारण्य स्थित प्रसिद्ध पांडूपोल हनुमान जी मंदिर तक जाने वाले सिलिबेरी गेट को अचानक बंद कर दिया गया है। इस निर्णय से स्थानीय ग्रामीणों और श्रद्धालुओं में गहरी नाराजगी फैल गई है। विपक्ष के नेता टीकाराम जूली ने इस कदम को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि सरकार को भगवान और उनके भक्तों के रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहिए।
जूली का स्पष्ट कहना है कि यह फैसला बिना सोच-समझ के लिया गया है और इससे लोगों की आस्था के साथ-साथ उनका रोजमर्रा का जीवन भी प्रभावित हो रहा है। उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे निर्णय समाज में अनावश्यक तनाव पैदा करते हैं और इन्हें तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।
आस्था का केंद्र, रोजाना पहुंचते हैं हजारों भक्त
पांडूपोल हनुमान मंदिर सरिस्का के भीतर स्थित सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। यहां सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के कई राज्यों से भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। वर्षों से सिलिबेरी गेट मंदिर तक पहुंचने का सबसे सुविधाजनक और छोटा मार्ग रहा है।
लेकिन अब अचानक इस रास्ते को बंद कर दिया गया। इससे भक्तों को लंबी दूरी और कठिन रास्ते से होकर मंदिर तक पहुंचना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के गेट बंद करना, प्रशासनिक संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है। कई श्रद्धालुओं ने इस फैसले के विरोध में ज्ञापन सौंपकर गेट को तुरंत खोलने की मांग की है।
बुजुर्ग, महिलाएं और बीमार श्रद्धालु सबसे ज्यादा प्रभावित
सिलिबेरी गेट के बंद होने से सबसे अधिक परेशानी बुजुर्गों और बीमार लोगों को हो रही है। अब उन्हें दुर्गम पहाड़ी मार्गों से होकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ग्रामीण बताते हैं कि इन रास्तों पर फिसलन, जंगली जानवरों का खतरा और ऊबड़-खाबड़ चढ़ाइयां हैं। कई लोग यात्रा बीच में ही छोड़कर वापस लौटने को मजबूर हो जाते हैं। इसके साथ-साथ स्थानीय लोगों का रोजाना का आना-जाना भी प्रभावित हुआ है। व्यापार, छोटे-मोटे रोजगार और मंदिर से जुड़ी दुकानों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। लोगों का कहना है कि यह फैसला उनकी रोजमर्रा की ज़िंदगी को मुश्किल बना रहा है और सरकार को इसकी गंभीरता समझनी चाहिए।
टीकाराम जूली का हस्तक्षेप — मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
स्थानीय लोगों की बढ़ती परेशानी को देखते हुए विपक्ष के नेता टीकाराम जूली ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सिलिबेरी गेट खोलने की मांग की है। जूली ने पत्र में कहा है कि यह केवल एक रास्ता बंद करने का मामला नहीं है, बल्कि यह भक्तों की आस्था, सुविधा और अधिकार से जुड़ा विषय है। उनका तर्क है कि जब तक कोई सुरक्षित और वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध नहीं कराया जाता, तब तक गेट बंद रखना अनुचित है। उन्होंने सरकार को आगाह किया कि अगर समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो लोगों का आक्रोश और बढ़ सकता है और प्रदर्शन तेज हो सकते हैं।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा असर
मंदिर से जुड़े कई परिवार रोज़ी-रोटी के लिए यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं पर निर्भर हैं। गेट बंद होने के बाद यात्रियों की संख्या में कमी आने लगी है। दुकानदारों, वाहन चालकों और ठेला-विक्रेताओं का कहना है कि उनकी आय आधी से भी कम रह गई है। गांवों में पहले से सीमित रोजगार अवसर होते हैं, ऐसे में यह फैसला उनके लिए अतिरिक्त संकट बनकर आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्णय लेने से पहले न तो उनसे बात की गई और न ही उनकी समस्याओं पर गौर किया गया।
श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस
कई भक्तों का कहना है कि मंदिर जाना सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि आस्था और भावनाओं से जुड़ा अनुभव है। सिलिबेरी गेट के बंद होने को वे सीधे-सीधे धार्मिक यात्रा पर रोक की तरह देखते हैं। लोगों का कहना है कि प्रशासन अगर किसी कारण से गेट बंद कर रहा है तो उसे पारदर्शिता के साथ कारण बताना चाहिए और साथ ही सुरक्षित वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराना चाहिए। फिलहाल, स्थिति को लेकर असमंजस बना हुआ है और लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सरकार जल्द कोई सकारात्मक निर्णय लेगी।
सरकार पर लापरवाही के आरोप
विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने गेट बंद कर श्रद्धालुओं की सुविधा को नज़रअंदाज किया है। वहीं प्रशासनिक स्तर पर यह कहा जा रहा है कि सुरक्षा और वन क्षेत्र से जुड़ी कुछ तकनीकी वजहें हो सकती हैं। हालांकि, अभी तक इस बारे में कोई आधिकारिक विस्तृत स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। इसी वजह से लोगों के मन में सवाल और नाराजगी दोनों बढ़ते जा रहे हैं।


