जोधपुर की तख्त सागर पहाड़ियों में स्थित सिद्धनाथ धाम आस्था, साधना और प्रकृति के अद्भुत संगम के रूप में जाना जाता है। पहाड़ियों के बीच बसे इस धाम की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में ही नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक चमत्कार के रूप में भी है। यहां स्थित गुफा में प्राकृतिक रूप से बना लटकता हुआ शिवलिंग और कलात्मक मंदिर संरचना श्रद्धालुओं को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु इसे केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र मानते हैं।
अनूठी बनावट और कलात्मक मंदिर
सिद्धनाथ धाम में स्थित सिद्धनाथ महादेव मंदिर अपनी अनूठी बनावट के कारण विशेष पहचान रखता है। मंदिर के पत्थरों पर शेषनाग और भगवान शिव की सुंदर आकृतियां उकेरी गई हैं, जो शिल्पकला की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली हैं। मंदिर का गुंबद भी इसे अलग पहचान देता है, जहां भगवान राम, भगवान कृष्ण और भगवान शिव के नाम छह अलग-अलग भाषाओं में अंकित हैं।
धाम की एक छोटी गुफा में प्राकृतिक रूप से बना पत्थर का ऐसा शिवलिंग है, जिसकी आकृति गाय के थन जैसी प्रतीत होती है और जो ऊपर से लटका हुआ दिखाई देता है। श्रद्धालु इसे कुदरत का चमत्कार मानते हैं। यह शिवलिंग किसी मानव निर्मित संरचना का परिणाम नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से निर्मित माना जाता है, यही कारण है कि इसकी मान्यता और श्रद्धा और भी बढ़ जाती है।
सिद्धनाथ धाम की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कथा
सिद्धनाथ धाम की कहानी वर्ष 1932 से जुड़ी है। उस समय परम योगी संत नारायण स्वामी, संत एकनाथ रानाडे के साथ जोधपुर पहुंचे थे। उन्होंने तख्त सागर की पहाड़ियों में बने छोटे से महादेव मंदिर और गुफा के दर्शन किए। यहां का शांत वातावरण, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा उन्हें इतनी प्रिय लगी कि उन्होंने इसी स्थान को अपनी तपोस्थली बना लिया। संत नारायण स्वामी यहीं साधना में लीन रहे। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद उनके शिष्य गौरी शंकर को उत्तराधिकारी बनाया गया, जो आगे चलकर संत नेपाली बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए। नेपाली बाबा ने इस धाम को एक नई पहचान दी और इसके विस्तार का कार्य आरंभ कराया।
नेपाली बाबा का योगदान और मंदिर विस्तार
संत नेपाली बाबा ने सिद्धनाथ धाम में भव्य समाधि स्थल का निर्माण कराया और पुराने मंदिर का विस्तार कर उसे कलात्मक स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने पुराने मंदिर के समीप सिद्धेश्वर महादेव नाम से एक नए मंदिर का निर्माण भी करवाया। यह मंदिर छीतर के पत्थरों से निर्मित है और इसके बाहर सफेद ग्रेनाइट पत्थर से बनी नंदी की प्रतिमा स्थापित की गई है। धार्मिक मान्यता है कि सिद्धनाथ मंदिर परिसर में प्राकृतिक रूप से 12 ज्योतिर्लिंग भी स्थापित माने जाते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष अभिषेक, रुद्राभिषेक और पूजा-अर्चना होती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
355 सीढ़ियां और अथक साधना
धाम तक पहुंचने का मार्ग पहले अत्यंत कठिन था। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए संत नेपाली बाबा ने पहाड़ी के पथरीले रास्ते पर 355 सीढ़ियों का निर्माण कराया। बताया जाता है कि वे दिव्यांग होने के बावजूद अपने हाथों में छेनी और हथौड़ा लेकर पत्थरों को तराशते थे। यह कार्य उनकी तपस्या, संकल्प और शिवभक्ति का जीवंत उदाहरण माना जाता है। आज ये सीढ़ियां न केवल धाम तक पहुंच का साधन हैं, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए साधना पथ का प्रतीक भी बन चुकी हैं।
गौशाला और औषधीय पौधों से सजा परिसर
सिद्धनाथ धाम केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि सेवा और प्रकृति संरक्षण का केंद्र भी है। मंदिर परिसर में एक गौशाला संचालित है, जहां 300 से अधिक गायों की सेवा की जाती है। इसके अतिरिक्त मंदिर परिसर और आसपास की पहाड़ियों में बड़ला, बेलपत्र, पीपल सहित हजारों औषधीय पौधे लगाए गए हैं। इन पौधों के कारण धाम का वातावरण न केवल शुद्ध और शांत रहता है, बल्कि यह स्थान प्राकृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है।
आस्था, प्रकृति और साधना का संगम
सिद्धनाथ धाम आज श्रद्धालुओं के लिए केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति और साधना का जीवंत संगम है। प्राकृतिक लटकता शिवलिंग, गुफा, पहाड़ों की शांति और संतों की तपस्या की गाथाएं इसे एक अद्वितीय धार्मिक स्थल बनाती हैं। यही कारण है कि तख्त सागर की पहाड़ियों में बसा यह धाम हर आने वाले श्रद्धालु के मन पर गहरी छाप छोड़ता है।


