राजस्थान विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान उस समय माहौल गरमा गया, जब कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री शांति धारीवाल ने ऐतिहासिक शिलालेखों को लेकर राज्य सरकार की नीति पर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने आमेर में स्थित एक प्राचीन शिलालेख का उदाहरण देते हुए भाजपा सरकार पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया, जिससे सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
आमेर के शिलालेख का दिया हवाला
शांति धारीवाल ने सदन में कहा कि मौजूदा सरकार लगातार मुगलों और पूर्ववर्ती शासकों से जुड़े नाम, प्रतीक और पहचान को हटाने की मुहिम चला रही है। शहरों के नाम बदलने से लेकर सड़कों और योजनाओं के नामकरण तक इस नीति को लागू किया जा रहा है। लेकिन इसी बीच आमेर में मौजूद मुगल बादशाह अकबर की प्रशंसा करने वाला शिलालेख आज भी पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सरकार की नीति एक जैसी है, तो फिर इस शिलालेख को अब तक क्यों नहीं हटाया गया।
सदन में पढ़े शिलालेख के शब्द
धारीवाल ने शिलालेख पर अंकित शब्दों को सदन में पढ़ते हुए सरकार को सीधे चुनौती दी। उन्होंने कहा कि उस शिलालेख पर लिखा है, “सुलतानों को पनाह देने वाले शहंशाह दीन और दुनिया के जलाल मोहम्मद अकबर बादशाह खुदाई बुजुर्ग, उनका मुल्क हमेशा कायम रहे।” इन शब्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट रूप से अकबर की प्रशंसा करता है, फिर भी सरकार इस पर चुप्पी साधे हुए है।
‘रिश्तेदारी निभा रही है सरकार?’—धारीवाल का तंज
कांग्रेस विधायक ने तंज कसते हुए पूछा कि जब सरकार हर जगह से पुराने नाम और प्रतीक हटाने की बात कर रही है, तो अकबर की प्रशंसा वाला यह शिलालेख अब तक क्यों नहीं हटाया गया। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि क्या सरकार यहां किसी पुरानी ‘रिश्तेदारी’ को निभा रही है या फिर यह जानबूझकर किया गया चयनात्मक रवैया है। उनके इस बयान के बाद सदन में शोर-शराबा बढ़ गया।
सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने
धारीवाल के आरोपों के बाद सत्ता पक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि ऐतिहासिक धरोहरों और शिलालेखों का संरक्षण पुरातत्व विभाग के नियमों और विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार किया जाता है। सरकार की ओर से कहा गया कि इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप निराधार है और विपक्ष केवल राजनीतिक लाभ के लिए विवाद खड़ा कर रहा है।
चयनात्मक नीति का आरोप
विपक्षी विधायकों ने शांति धारीवाल के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि सरकार इतिहास को अपने राजनीतिक नजरिये से देख रही है। उनका आरोप था कि जो बातें सरकार के एजेंडे में फिट बैठती हैं, उन्हें ही निशाना बनाया जाता है, जबकि बाकी तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इस बहस ने विधानसभा में इतिहास, विरासत और राजनीति के बीच नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
कुल मिलाकर, अकबर के शिलालेख को लेकर उठे सवालों ने सरकार की नीतियों पर गंभीर बहस छेड़ दी है। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट रुख अपनाती है या यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाता है।


