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संस्कृत सभी भाषाओं की जननी, सिंधी भाषा सबसे निकट: राज्यपाल हरिभाऊ बागडे

संस्कृत सभी भाषाओं की जननी, सिंधी भाषा सबसे निकट: राज्यपाल हरिभाऊ बागडे

राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है और इसे सभी भाषाओं की जननी माना जाता है। उन्होंने कहा कि देश में प्रचलित लगभग सभी भाषाओं में संस्कृत के शब्द समाहित हैं। आधुनिक भारतीय भाषाओं में सिंधी भाषा संस्कृत के सबसे अधिक निकट है, जिसके लगभग 70 प्रतिशत शब्द संस्कृत से मिलते-जुलते हैं। राज्यपाल यह विचार गुरुवार को कोटा विश्वविद्यालय के नागार्जुन सभागार में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त कर रहे थे। यह संगोष्ठी ‘सिंधी संस्कृति, अध्ययन एवं परम्परा’ विषय पर आयोजित की गई थी, जिसका आयोजन राष्ट्रीय सिंधी भाषा परिषद और सिंधु अध्ययन शोध पीठ, कोटा विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में हुआ।

भाषा विविधता में निहित है भारत की एकता

हरिभाऊ बागडे ने कहा कि भारत भाषा और संस्कृति की विविधता के कारण विश्व के श्रेष्ठ देशों में शामिल है। देश में अनेक भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन यह विविधता एकता की डोर से बंधी हुई है। भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और परम्पराओं की वाहक होती हैं। उन्होंने कहा कि भाषाओं की विविधता भारत की सांस्कृतिक सुगंध को और समृद्ध बनाती है।

सिंधु घाटी सभ्यता का ऐतिहासिक महत्व

राज्यपाल ने कहा कि विश्व की तीन प्रारंभिक सभ्यताओं—मिश्र, मेसोपोटामिया और सिंधु घाटी—में से सिंधु घाटी सभ्यता सबसे व्यापक और उन्नत थी। उस समय के शहर अत्यंत परिष्कृत थे और उच्च स्तर की नगर योजना को दर्शाते थे। यह सभ्यता विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध सभ्यताओं में गिनी जाती है। उन्होंने कहा कि सिंधी सभ्यता और संस्कृति के अध्ययन पर केंद्रित इस प्रकार की संगोष्ठियां आमजन को सिंधी भाषा, संस्कृति और उसकी समृद्ध परम्पराओं से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सिंधी समाज की मेहनत और व्यापारिक कुशलता

हरिभाऊ बागडे ने कहा कि सिंधी संस्कृति जितनी समृद्ध है, उतनी ही व्यापारिक कुशलता सिंधी समाज के लोगों में देखने को मिलती है। देश विभाजन के समय सिंधी समाज ने अपना सब कुछ छोड़कर भारत को अपनाया। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने परिश्रम और ईमानदारी के बल पर व्यापार जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने कहा कि सिंधी समाज के आध्यात्मिक गुरुओं ने समाज को संगठित रखने और संस्कृति को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया। संत कंवरराम मानवता की सेवा के लिए जाने जाते हैं, जबकि साधु वासवानी ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भारतीय शिक्षा पद्धति और औपनिवेशिक प्रभाव

राज्यपाल ने भारतीय शिक्षा पद्धति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत का ज्ञान सूर्य युगों से प्रकाशमान रहा है। 1835 से पहले भारत एक समृद्ध राष्ट्र था। भारतीय समाज की नैतिकता, ईमानदारी और सहयोग की भावना के कारण अंग्रेजों को भारत को गुलाम बनाने में कठिनाई हो रही थी। उन्होंने कहा कि इसी कारण लॉर्ड मैकाले ने 1835 में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति लागू कर गुरुकुल प्रणाली को समाप्त कराया। घरेलू उद्योगों को बंद कर भारत को आर्थिक रूप से कमजोर किया गया और शिक्षा व्यवस्था में बदलाव कर भारतीय समाज की जड़ों को कमजोर करने का प्रयास किया गया।

सिंधी भाषा पहचान और धरोहर: वासुदेव देवनानी

संगोष्ठी में विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने हिंदी के साथ-साथ सिंधी भाषा में भी अपने विचार रखे। उन्होंने 19वीं शताब्दी के विद्वान डॉ. अर्नेस्ट ट्रम्प का उल्लेख करते हुए कहा कि सिंधी भाषा संस्कृत की शुद्धतम संतान है, जिसमें विदेशी तत्व न्यूनतम हैं। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है। उन्होंने सिंधी भाषा की मधुरता और समृद्धि को अद्वितीय बताया।

घर-घर सिंधी भाषा को बढ़ावा देने का आह्वान

देवनानी ने सिंधी समाज से आह्वान किया कि प्रत्येक सिंधी परिवार यह संकल्प ले कि प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा घर में केवल सिंधी भाषा में बातचीत की जाएगी। उन्होंने बताया कि सिंधी समाज के महान संतों और स्वतंत्रता सेनानी हेमू कालानी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है, ताकि नई पीढ़ी अपनी विरासत से जुड़ सके। उन्होंने यह भी घोषणा की कि अजमेर की प्रसिद्ध फॉय सागर झील का नाम बदलकर वरुण सागर रखा जाएगा और वहां वरुण देवता की 15 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जाएगी।

विकसित भारत में सिंधी समाज की भूमिका

विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक विकसित भारत के सपने को साकार करने में सिंधी समाज का बड़ा योगदान रहेगा। उन्होंने बताया कि देश के आयकर में लगभग 24 प्रतिशत योगदान सिंधी समाज के व्यवसायियों का है।

उन्होंने कहा कि सिंधी समाज ने राजस्थान में बसकर राजस्थानी संस्कृति के साथ समन्वय स्थापित किया और अपनी भाषा, परम्पराओं और पहचान को भी जीवित रखा। चेटीचंड जैसे पर्व सिंधी संस्कृति की जीवंतता के प्रतीक हैं और सिंधु नदी की निरंतर बहती धारा की याद दिलाते हैं।

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