शोभना शर्मा। राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने SIR (Special Summary Revision) प्रक्रिया को लेकर बड़ा बयान देते हुए निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। जयपुर में मीडिया से बातचीत करते हुए पायलट ने कहा कि देश में पहले भी SIR की प्रक्रिया चलती रही है, लेकिन इस बार इससे जुड़े विवाद, आशंकाएं और जनता में अविश्वास पहली बार उभरकर सामने आया है।
“पहली बार SIR प्रक्रिया पर संशय और चिंता”
पायलट के अनुसार इस बार निर्वाचन आयोग के रवैये ने कई राज्यों के मतदाताओं में बेचैनी और अनिश्चितता पैदा की है। उन्होंने कहा कि बिहार में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे जाने की शिकायतें सामने आईं और वर्तमान अभियान में भी लोगों को सुधार के लिए बहुत कम समय दिया गया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता नहीं रखी गई, जिसके चलते व्यापक असंतोष देखा जा रहा है।
बीएलओ पर दबाव और आत्महत्या के मामले उठाए
सचिन पायलट ने चुनाव आयोग के समक्ष सबसे गंभीर आरोप बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) के तनाव और आत्महत्या के मुद्दे पर लगाया। उन्होंने कहा कि देश के कई राज्यों में बीएलओ पर अत्यधिक दबाव डाला जा रहा है, जिसके कारण कोई तनाव में है तो कोई आत्महत्या करने तक मजबूर हो रहा है।
पायलट के शब्दों में—“अगर इतने राज्यों में बीएलओ तनाव में हैं या आत्महत्या कर रहे हैं, तो स्पष्ट रूप से कोई न कोई गड़बड़ी हो रही है। निर्वाचन आयोग का काम निष्पक्ष तरीके से लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना है, न कि डर और दबाव के बीच काम कराना।”
मतदाता सूची में नाम कटने की साजिश पर चिंता
कांग्रेस नेता ने आशंका जताई कि विशेषकर गरीब, दलित, आदिवासी और बुजुर्ग मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की कोशिशें हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि जानकारी के अभाव या प्रक्रिया को समझ न पाने के कारण लाखों लोगों के वोट अधिकार प्रभावित हो सकते हैं, जो कि संविधान के खिलाफ है और लोकतंत्र के लिए खतरा है।
कांग्रेस का राष्ट्रव्यापी अभियान जारी
पायलट ने बताया कि कांग्रेस पूरे देश में अभियान चला रही है ताकि लोगों को उनके नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रखने के लिए जागरूक किया जा सके। उन्होंने कहा कि यदि शासन या विचारधारा के दबाव में निर्वाचन आयोग काम करेगा तो न जनता और न ही कांग्रेस पार्टी इसे स्वीकार करेगी।
पायलट ने दोहराया कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण निष्पक्ष संस्था के रूप में निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है, न कि किसी राजनीतिक दल की।


