शोभना शर्मा। राजस्थान में RPSC द्वारा सहायक अभियोजन अधिकारी (Assistant Prosecution Officer) भर्ती परीक्षा का परिणाम सामने आने के बाद राज्यभर में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हजारों अभ्यर्थियों की उम्मीदों पर उस समय पानी फिर गया जब 181 पदों के लिए आयोजित भर्ती परीक्षा में केवल चार उम्मीदवारों को ही सफल घोषित किया गया। नतीजों की यह स्थिति सामने आते ही अभ्यर्थियों में गहरा आक्रोश फैल गया और अब यह मामला सीधे अदालत की दहलीज तक पहुंच गया है। अभ्यर्थी इसे अपने साथ अन्याय बताते हुए न्याय की गुहार लगा रहे हैं।
RPSC ने 181 पदों के लिए निकाली थी भर्ती
इस भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा सहायक अभियोजन अधिकारी के 181 पदों के लिए की गई थी। बड़ी संख्या में युवाओं ने इस परीक्षा में भाग लिया और लंबे समय तक तैयारी की। प्रारंभिक परीक्षा के बाद चयनित होकर 2700 अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा तक पहुंचे। मुख्य परीक्षा को लेकर अभ्यर्थियों को उम्मीद थी कि बड़ी संख्या में चयन होगा, लेकिन परिणाम ने सबको चौंका दिया।
दो चरणों में हुई थी परीक्षा प्रक्रिया
सहायक अभियोजन अधिकारी भर्ती परीक्षा दो चरणों में आयोजित की गई थी। पहले चरण में प्रारंभिक परीक्षा आयोजित की गई, जिसमें सफल अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा में शामिल होने का मौका मिला। प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद कुल 2700 अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा में बैठे। यह मुख्य परीक्षा 1 जून को आयोजित हुई थी और इसमें कुल दो प्रश्नपत्र शामिल थे।
विधि और भाषा के दो पेपर
मुख्य परीक्षा का पहला पेपर विधि विषय से संबंधित था, जो 300 अंकों का था। यह पेपर कानून की गहरी समझ, व्यावहारिक ज्ञान और विश्लेषण क्षमता को परखने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। दूसरा पेपर हिंदी और अंग्रेजी भाषा का था, जो 100 अंकों का था। भर्ती नियमों के अनुसार, हर अभ्यर्थी के लिए यह अनिवार्य था कि वह प्रत्येक पेपर में न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक प्राप्त करे।
न्यूनतम अंक की शर्त बनी बड़ी बाधा
राजस्थान लोक सेवा आयोग का कहना है कि अधिकांश अभ्यर्थी न्यूनतम अंकों की शर्त को पूरा नहीं कर सके। आयोग के मुताबिक, 2700 में से 2696 अभ्यर्थी इस मानक पर खरे नहीं उतरे और केवल चार उम्मीदवार ही दोनों पेपर में न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक हासिल कर पाए। यही वजह बताई जा रही है कि चयन सूची इतनी छोटी रह गई।
परिणाम जारी होते ही मचा हंगामा
10 दिसंबर 2025 को जैसे ही भर्ती परीक्षा का परिणाम जारी किया गया, उसी दिन से विवाद शुरू हो गया। इतनी बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के असफल होने से सभी हैरान रह गए। उम्मीदवारों ने सवाल उठाए कि क्या मूल्यांकन सही और निष्पक्ष तरीके से किया गया। उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर असफलता अस्वाभाविक है और इससे मूल्यांकन प्रक्रिया पर संदेह पैदा होता है।
मूल्यांकन नीति को लेकर उठे सवाल
अभ्यर्थियों का आरोप है कि आयोग ने मूल्यांकन की कोई स्पष्ट और पारदर्शी नीति सार्वजनिक नहीं की। न तो यह बताया गया कि उत्तर पुस्तिकाओं की जांच किस आधार पर की गई और न ही यह स्पष्ट किया गया कि कट-ऑफ तय करने का मानदंड क्या रहा। इसी कारण संदेह और गहरा हो गया है और अभ्यर्थियों को लग रहा है कि कहीं न कहीं गंभीर चूक या मनमानी हुई है।
हाईकोर्ट में दायर हुई याचिका
नतीजों से असंतुष्ट अभ्यर्थियों ने अब राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया है। यह याचिका अधिवक्ता तनवीर अहमद के माध्यम से दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि भर्ती परीक्षा का परिणाम मनमाना, अव्यावहारिक और तर्कहीन है। अभ्यर्थियों का दावा है कि यह प्रक्रिया संविधान में प्रदत्त मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है।
परिणाम पर रोक लगाने की मांग
याचिका में अदालत से मांग की गई है कि वर्तमान परिणाम पर तत्काल रोक लगाई जाए। अभ्यर्थियों का कहना है कि जब तक पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हो जाती, तब तक इस परिणाम को लागू करना गलत होगा। इसके साथ ही उन्होंने पूरे नतीजे को रद्द करने की भी मांग की है।
पुनर्मूल्यांकन और पारदर्शिता की मांग
अभ्यर्थियों की प्रमुख मांगों में उत्तर पुस्तिकाओं का दोबारा मूल्यांकन शामिल है। उनका कहना है कि मूल्यांकन प्रक्रिया को गैरकानूनी घोषित कर स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से पुनर्मूल्यांकन कराया जाए। इसके साथ ही आयोग को निर्देश दिए जाएं कि भविष्य में ऐसी परीक्षाओं में पूर्ण पारदर्शिता बरती जाए।


