मनीषा शर्मा। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने डिजिटल बैंकिंग और फंड ट्रांसफर को सुरक्षित और आसान बनाने के लिए एक बड़ी घोषणा की है। अब रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट सिस्टम (RTGS) और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड्स ट्रांसफर (NEFT) के जरिए फंड ट्रांसफर करने से पहले रिसीवर यानी बेनिफिशियरी अकाउंट होल्डर के नाम को वेरिफाई करने की सुविधा मिलेगी। यह नई सुविधा 1 अप्रैल 2025 से लागू होगी।
नेम वेरिफिकेशन फैसिलिटी क्या है?
नेम वेरिफिकेशन फैसिलिटी एक ऐसा तंत्र है, जिसमें फंड ट्रांसफर शुरू करने से पहले, ट्रांजेक्शन करने वाला व्यक्ति बेनिफिशियरी का नाम और अन्य विवरण देख सकेगा।
इसका उद्देश्य है:
गलत खाते में फंड ट्रांसफर को रोकना।
फ्रॉड और धोखाधड़ी पर लगाम लगाना।
उपभोक्ताओं को अधिक सुरक्षा प्रदान करना।
फंड ट्रांसफर में नाम वेरिफिकेशन की आवश्यकता क्यों?
ऑनलाइन बैंकिंग के बढ़ते उपयोग के साथ, RTGS और NEFT का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। लेकिन, कई बार ग्राहकों से गलती से गलत खाते में पैसा ट्रांसफर हो जाता है।
RTGS और NEFT में, वर्तमान में केवल खाता नंबर और IFSC कोड का उपयोग किया जाता है।
रिसीवर का नाम डिस्प्ले न होने के कारण ग्राहक गलत खाते में पैसा भेज सकते हैं।
यह न केवल उपभोक्ताओं के लिए परेशानी का कारण बनता है, बल्कि फंड रिकवरी प्रक्रिया भी जटिल हो जाती है।
UPI और IMPS में पहले से मौजूद यह सुविधा
यूनाइटेड पेमेंट इंटरफेस (UPI) और इमीडिएट पेमेंट सर्विस (IMPS) में नाम वेरिफिकेशन की सुविधा पहले से उपलब्ध है।
- UPI में: ट्रांजेक्शन शुरू करने से पहले रिसीवर का नाम और अन्य डिटेल्स दिखती हैं।
- IMPS में: यह सुविधा सुनिश्चित करती है कि फंड केवल सही व्यक्ति को भेजा जाए।
अब, RBI इसी सुविधा को RTGS और NEFT सिस्टम में भी शामिल कर रहा है।
नेम वेरिफिकेशन फैसिलिटी कैसे काम करेगी?
RBI ने नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) को इस फैसिलिटी को विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी है। यह सुविधा निम्नलिखित चरणों में काम करेगी:
- बेनिफिशियरी का नाम डिस्प्ले:
जब ग्राहक फंड ट्रांसफर शुरू करेगा, तो रिसीवर के खाता नंबर और IFSC कोड डालने पर उसका नाम स्क्रीन पर दिखाई देगा।- सत्यापन:
ग्राहक रिसीवर के नाम और अन्य विवरण की पुष्टि करेगा।- ट्रांजेक्शन की स्वीकृति:
विवरण सही पाए जाने पर ही ट्रांजेक्शन आगे बढ़ेगा।
सभी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी सुविधा
नेम वेरिफिकेशन सुविधा को सभी बैंकों और प्लेटफॉर्म्स पर लागू किया जाएगा।
इंटरनेट बैंकिंग: ग्राहकों को ऑनलाइन पोर्टल्स पर रिसीवर का नाम देखने का विकल्प मिलेगा।
मोबाइल बैंकिंग: मोबाइल ऐप्स पर भी यह सुविधा उपलब्ध होगी।
ब्रांच बैंकिंग: बैंक शाखाओं में जाकर भी ग्राहक फंड ट्रांसफर से पहले रिसीवर के विवरण की पुष्टि कर सकेंगे।
फंड ट्रांसफर की प्रक्रिया में क्या बदलाव आएंगे?
इस नई सुविधा के साथ, RTGS और NEFT के जरिए फंड ट्रांसफर करते समय:
ग्राहक को रिसीवर का नाम और खाता विवरण देखने का मौका मिलेगा।
ट्रांजेक्शन केवल सत्यापित होने पर ही पूरा होगा।
गलती से गलत खाते में पैसे जाने की संभावना कम होगी।
ग्राहकों के लिए मुख्य लाभ
- गलत ट्रांसफर पर रोक:
गलत खाता नंबर डालने पर रिसीवर का नाम न मिलने से ग्राहक को तुरंत अपनी गलती का पता चल जाएगा।- फ्रॉड में कमी:
बेनिफिशियरी का नाम देखकर ग्राहक को यह सुनिश्चित करने का मौका मिलेगा कि पैसा सही व्यक्ति को जा रहा है।- सुरक्षित और विश्वसनीय ट्रांजेक्शन:
ग्राहकों को अपने फंड ट्रांसफर पर अधिक भरोसा होगा।
बैंकों और उपभोक्ताओं पर प्रभाव
1. बैंकों पर:
- बैंकों को नए सिस्टम को अपनाने के लिए अपने सर्वर और सॉफ्टवेयर को अपग्रेड करना होगा।
- हालांकि, इससे बैंकों की ग्राहक सेवा में सुधार होगा और धोखाधड़ी के मामलों में कमी आएगी।
2. उपभोक्ताओं पर:
ग्राहकों के लिए यह सुविधा ऑनलाइन बैंकिंग को और अधिक सुरक्षित बनाएगी।
फंड रिकवरी में लगने वाले समय और परेशानियों को कम करेगी।
आरबीआई की इस पहल का व्यापक असर
RTGS और NEFT में नेम वेरिफिकेशन फैसिलिटी आरबीआई की डिजिटल बैंकिंग को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे भारत की फिनटेक इंडस्ट्री और अधिक विश्वसनीय और सुरक्षित बनेगी।


