मनीषा शर्मा, अजमेर। राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) ने प्रदेशभर में संचालित करीब 80 हजार ई-मित्र कियोस्कों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। आयोग के अनुसार बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां ई-मित्र संचालक अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता की जांच किए बिना ही ऑनलाइन आवेदन भर रहे हैं। इस लापरवाही के कारण विभिन्न प्रतियोगी भर्तियों में अपात्र अभ्यर्थियों के आवेदन लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जिससे पूरी भर्ती प्रक्रिया पर अनावश्यक दबाव पड़ रहा है।
आयोग ने इस पूरे मामले को गंभीर मानते हुए सूचना एवं प्रौद्योगिकी तथा संचार विभाग को पत्र लिखकर निर्देश जारी करने को कहा है, ताकि ई-मित्र संचालकों को आवेदन प्रक्रिया के नियमों और जिम्मेदारियों के बारे में स्पष्ट रूप से अवगत कराया जा सके।
आयोग सचिव राम निवास मेहता के अनुसार, जब किसी भर्ती का विज्ञापन जारी होता है, तब कई ई-मित्र संचालक आवेदन भरते समय अभ्यर्थियों के मूल दस्तावेज या न्यूनतम योग्यता की जांच नहीं करते। कई मामलों में केवल मोबाइल पर आने वाले ओटीपी के आधार पर फॉर्म सबमिट कर दिया जाता है। इससे ऐसे उम्मीदवार भी आवेदन कर देते हैं जिनकी योग्यता उस पद के मानदंडों से मेल नहीं खाती।
इस लापरवाही का असर सीधे भर्ती ढांचे पर पड़ रहा है। आयोग के पास लाखों आवेदन पहुंचते हैं, जिनमें बड़ी संख्या अपात्र अभ्यर्थियों की होती है। परिणामस्वरूप प्रश्नपत्र तैयारी, परीक्षा आयोजन, उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और परिणाम घोषित करने जैसी प्रक्रियाओं में अतिरिक्त समय, मानव संसाधन और सरकारी धन खर्च होता है। आयोग का मानना है कि यदि आवेदन से पहले योग्यता की उचित जांच हो, तो इस बर्बादी को काफी हद तक रोका जा सकता है।
केवल आवेदन भरने की भूल समझकर इसे नजरअंदाज न करते हुए आयोग ने स्पष्ट चेतावनी भी दी है। आयोग के अनुसार गलत जानकारी देकर या बिना योग्यता जांचे आवेदन करने में ई-मित्र संचालक भी समान रूप से जिम्मेदार होंगे। ऐसे मामलों में उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 217 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यह प्रावधान उन स्थितियों के लिए है, जहां किसी अधिकृत व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्य के विरुद्ध काम किया जाता है और उससे सार्वजनिक नुकसान होता है।
आयोग ने सभी जिला कलेक्टरों से भी आग्रह किया है कि वे अपने-अपने जिलों में ई-मित्र कियोस्कों की नियमित निगरानी सुनिश्चित करें। निर्देशों में कहा गया है कि जो संचालक नियमों की अनदेखी करते पाए जाएं, उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लग सके।
इसके साथ ही सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग को ई-मित्र संचालकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए गए हैं। इन प्रशिक्षणों में आवेदन प्रक्रिया, दस्तावेज सत्यापन, योग्यता मानदंड और कानूनी जिम्मेदारियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाएगी। आयोग का मानना है कि प्रशिक्षित संचालक न केवल त्रुटियां कम करेंगे, बल्कि अभ्यर्थियों को सही मार्गदर्शन भी दे सकेंगे।
आयोग ने अभ्यर्थियों को भी जिम्मेदार बनाते हुए अपील की है कि वे आवेदन करने से पहले भर्ती विज्ञापन को ध्यान से पढ़ें और यह सुनिश्चित करें कि उनकी योग्यता निर्धारित मानकों के अनुरूप है। आयोग ने स्पष्ट किया कि गलत जानकारी देकर आवेदन करने पर अभ्यर्थियों के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है और बाद में चयन प्रक्रिया से बाहर होना तय है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ ऐसे खतरे भी बढ़े हैं, जहां सुविधा के नाम पर प्रक्रिया का दुरुपयोग होने लगता है। RPSC का यह कदम न केवल भर्ती व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की दिशा में है, बल्कि ई-गवर्नेंस सेवाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने का भी प्रयास है।
आगे आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निर्देशों और चेतावनियों का वास्तविक असर कितना पड़ता है। यदि ई-मित्र संचालक जिम्मेदारी से काम करें और अभ्यर्थी भी अपनी योग्यता को लेकर सजग रहें, तो भर्ती प्रक्रिया अधिक सरल, पारदर्शी और समयबद्ध हो सकती है।


