शोभना शर्मा। क्या आपको भी रात में सोते समय पैरों में झनझनाहट, चुभन या बेचैनी महसूस होती है? ऐसा लगता है कि पैर हिलाए बिना आराम मिल ही नहीं सकता, और थोड़ी देर चलने या पैरों को हिलाने से भले ही राहत मिल जाती हो, लेकिन लेटते ही बेचैनी फिर शुरू हो जाती है। कई महिलाएं इसे सामान्य थकान, कमजोरी या कैल्शियम की कमी समझकर नजरअंदाज कर देती हैं। लेकिन यह लक्षण Restless Legs Syndrome (RLS) की ओर संकेत कर सकता है — एक न्यूरोलॉजिकल विकार जो महिलाओं में पुरुषों की तुलना में अधिक पाया जाता है। RLS में दिमाग से पैरों तक गलत या जरूरत से ज्यादा सिग्नल पहुंचते हैं, जिससे सोते वक्त पैरों को आराम नहीं मिल पाता। नींद में बाधा, चिड़चिड़ापन, थकान और तनाव इसके साथ जुड़ जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर महिलाओं में RLS अधिक क्यों पाया जाता है? इसके पीछे कई मेडिकल और जैविक कारण हैं।
आयरन की कमी (Iron Deficiency) — सबसे बड़ा कारण
महिलाओं में आयरन की कमी बहुत अधिक पाई जाती है, चाहे वह पीरियड्स, गर्भावस्था या प्रसव के बाद हो। आयरन सिर्फ खून का स्तर बनाए रखने के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि यह दिमाग के उस हिस्से को भी प्रभावित करता है जो नसों के सिग्नल और पैरों की मूवमेंट को नियंत्रित करता है। जब शरीर में आयरन की कमी होती है, तो दिमाग पैरों को बार-बार गलत या अनावश्यक सिग्नल भेजने लगता है। परिणामस्वरूप रात में पैरों में बेचैनी, झनझनाहट और चुभन बढ़ जाती है। इसलिए आयरन डेफिशिएंसी महिलाओं में RLS का प्रमुख कारण माना जाता है।
हार्मोनल बदलाव (Hormonal Changes) — महिलाओं में इसलिए ज्यादा जोखिम
महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन लगातार बदलते रहते हैं। इन बदलावों का प्रकोप इन स्थितियों में ज्यादा होता है:
पीरियड्स
प्रेगनेंसी
मेनोपॉज
हार्मोनल उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव डोपामाइन नामक न्यूरोट्रांसमीटर पर पड़ता है, जो पैरों की मूवमेंट कंट्रोल करता है। जब डोपामाइन का संतुलन बिगड़ता है, तो पैरों में बेचैनी, तनाव और हिलाने की अनियंत्रित इच्छा बढ़ जाती है। यही वजह है कि गर्भावस्था और मेनोपॉज के दौरान RLS के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं।
मेडिकल स्थितियां और दवाओं का प्रभाव
महिलाओं में माइग्रेन, थायरॉयड समस्या, एंग्जायटी, अनिद्रा और तनाव जैसी स्थितियां अधिक पाई जाती हैं। विशेष रूप से इन स्थितियों में उपयोग की जाने वाली कई दवाएं तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती हैं, जो RLS को ट्रिगर कर सकती हैं। दवाइयों के सेवन के बाद पैरों में अजीब हरकत, जलन या बेचैनी महसूस होना इस संबंध का संकेत हो सकता है। इसलिए RLS की स्थिति में चिकित्सकीय परामर्श के बिना दवाइयों का परिवर्तन नुकसानदेह हो सकता है।
आनुवंशिक कारण (Genetics)
यदि परिवार में किसी सदस्य को Restless Legs Syndrome रहा है, तो महिलाओं में इसके विकसित होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है। आनुवंशिक प्रवृत्ति RLS के सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक मानी जाती है। शुरुआती संकेतों को पहचानकर चिकित्सकीय सलाह लेने से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
उम्र और लाइफस्टाइल का प्रभाव
30 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं में शारीरिक बदलाव तेजी से बढ़ते हैं — जैसे थकान, व्यायाम की कमी, लंबे समय तक बैठना, ऑफिस डेस्क जॉब, तनाव और अनियमित नींद। ये सभी कारण तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हैं और RLS को बढ़ावा देते हैं। उम्र बढ़ने के साथ यह समस्या महिलाओं में ज्यादा और पुरुषों में अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
RLS को नजरअंदाज करना खतरनाक
कई महिलाएं इसे सामान्य थकान समझकर छोड़ देती हैं, जबकि इसकी अनदेखी से नींद की कमी, तनाव, डिप्रेशन, हार्मोनल गड़बड़ी और क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम जैसी समस्याएं विकसित हो सकती हैं। RLS कोई साधारण कमजोरी नहीं, बल्कि दिमाग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ा विकार है, जिसे पहचान और इलाज की आवश्यकता होती है।


