अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया सीजफायर का असर अब भारत के कृषि और व्यापारिक बाजारों में साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। बीते दो दिनों के भीतर देश में थोक स्तर पर चावल की कीमतों में करीब 7 प्रतिशत तक की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह उछाल उस समय आया है, जब हाल ही में कीमतों में करीब 6 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली थी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाओं के सीधे प्रभाव का उदाहरण है, जहां अंतरराष्ट्रीय घटनाएं घरेलू बाजारों को भी प्रभावित कर रही हैं।
दरअसल, ईरान से जुड़े युद्ध के चलते समुद्री मार्गों में आई बाधाओं के कारण चावल के निर्यात पर असर पड़ा था, जिससे कीमतों में गिरावट आई थी। लेकिन जैसे ही अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की खबर सामने आई, बाजार में तेजी लौट आई। मध्य पूर्व और अमेरिका से चावल के बड़े ऑर्डर आने शुरू हो गए, जिससे निर्यातकों को नई ऊर्जा मिली और कीमतों में तेजी आ गई। इस तेजी का असर अब धीरे-धीरे खुदरा बाजारों तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन के वाइस-प्रेसिडेंट देव गर्ग के अनुसार, आने वाले पखवाड़े में खुदरा स्तर पर भी चावल की कीमतों में बढ़ोतरी महसूस की जा सकती है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ समय में व्यापारिक गतिविधियों में जो रुकावटें आई थीं, अब वे धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं और बाजार सामान्य स्थिति की ओर लौट रहा है।
हालांकि, यह भी सच है कि युद्ध के दौरान व्यापारिक गतिविधियों में भारी बाधाएं उत्पन्न हुई थीं। खासतौर पर बासमती चावल की लगभग 4 लाख टन खेप बंदरगाहों या रास्ते में अटक गई थी, जिससे निर्यात चक्र प्रभावित हुआ। इसके चलते निर्यातकों को भारी वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ा। क्रेडिट असेसमेंट फर्म Rubix Data Sciences के सह-संस्थापक मोहन रामास्वामी के अनुसार, इस दौरान निर्यातकों के करीब 2,000 से 2,500 करोड़ रुपए के भुगतान अटक गए, खासकर ईरान जैसे बाजारों में, जहां बैंकिंग और भुगतान प्रणाली पहले से ही जटिल बनी हुई है।
सीजफायर के बाद हालांकि चावल व्यापार में सकारात्मक माहौल बनता दिख रहा है। निर्यातक अब पश्चिमी एशियाई देशों के लिए बासमती और गैर-बासमती दोनों तरह के चावल की खेप भेजने की तैयारी में जुट गए हैं। All India Rice Exporters Association के अध्यक्ष सतीश गोयल ने बताया कि मुंद्रा और कांडला जैसे प्रमुख बंदरगाहों पर कंटेनर पहले से तैयार रखे गए हैं और जल्द ही निर्यात फिर से शुरू हो जाएगा। इससे आने वाले दिनों में व्यापार में तेजी और राजस्व में वृद्धि की उम्मीद जताई जा रही है।
इसी बीच, भारत सरकार ने भी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। Directorate General of Foreign Trade द्वारा जारी नए नोटिफिकेशन के अनुसार, अब चावल निर्यात के लिए एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (EIC) का प्रमाणपत्र केवल यूरोपीय संघ और ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों के लिए ही अनिवार्य रहेगा। अन्य यूरोपीय देशों के लिए इस नियम में छह महीने की छूट दी गई है। इस फैसले का उद्देश्य निर्यात प्रक्रिया को सरल बनाना और व्यापारिक गतिविधियों को गति देना है।
इसके अलावा, निर्यात नीति को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ढालने के लिए भी कई बदलाव किए गए हैं। पशु उत्पादों के निर्यात में वेटनरी हेल्थ सर्टिफिकेट की अनिवार्यता जैसे प्रावधानों को शामिल किया गया है, ताकि आयात करने वाले देशों की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा किया जा सके। इसी क्रम में प्राकृतिक शहद पर न्यूनतम निर्यात मूल्य को भी बढ़ाया गया है, जिससे इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
इन सभी नीतिगत बदलावों का मकसद भारत के निर्यात सेक्टर को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप बनाना है। साथ ही, यह सुनिश्चित करना भी है कि भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनी रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कदमों से चावल निर्यात को नया प्रोत्साहन मिलेगा और भारत अपनी वैश्विक बाजार में स्थिति को और मजबूत कर सकेगा।


