राजस्थान की वरिष्ठ IAS अधिकारी और डिस्कॉम की चेयरपर्सन आरती डोगरा को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच द्वारा दिए गए एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) जांच के आदेश पर रोक लगा दी है। यह राहत उन्हें मात्र 24 घंटे के भीतर मिली, जिससे यह मामला प्रशासनिक और न्यायिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है।
डिवीजन बेंच के इस फैसले के बाद फिलहाल आरती डोगरा के खिलाफ ACB जांच की प्रक्रिया पर अस्थायी विराम लग गया है। मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस शुभा मेहता की खंडपीठ में हुई। अदालत में आरती डोगरा और डिस्कॉम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर.एन. माथुर ने पक्ष रखा और सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान आरती डोगरा की ओर से अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ पहले से तीन विभागीय जांच लंबित हैं। इन जांचों पर जल्द निर्णय लिया जाना है और पूरे मामले को भ्रष्टाचार से जोड़ना उचित नहीं है। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं और विभागीय निर्णयों को सीधे भ्रष्टाचार मान लेना न्यायसंगत नहीं होगा।
गौरतलब है कि राजस्थान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने गुरुवार को आरती डोगरा के खिलाफ ACB जांच का आदेश दिया था। यह आदेश जस्टिस रवि चिरानिया की अदालत ने सुपरिटेंडेंट इंजीनियर आर.के. मीणा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया था। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि मामले की परिस्थितियां भ्रष्टाचार की आशंका उत्पन्न करती हैं, इसलिए स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए।
सिंगल बेंच ने अपने आदेश में टिप्पणी की थी कि डिस्कॉम चेयरपर्सन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ लंबित जांच पर कई महीनों तक जानबूझकर निर्णय नहीं लिया। अदालत ने माना था कि ऐसी परिस्थितियों में संदेह के पर्याप्त आधार दिखाई देते हैं। इसी कारण ACB को तीन महीने के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारी ने अपने प्रशासनिक दायित्वों का समुचित निर्वहन नहीं किया। इसी टिप्पणी के बाद यह मामला तेजी से सुर्खियों में आ गया था और प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल बढ़ गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि सुपरिटेंडेंट इंजीनियर आर.के. मीणा की पदोन्नति विवाद से जुड़ी हुई है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया था कि वर्ष 2022-23 की विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की प्रक्रिया को उन्होंने दिसंबर 2023 में हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका आरोप था कि विभाग सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और कार्मिक विभाग के नियमों के बावजूद रोस्टर प्रणाली का पालन किए बिना प्रमोशन प्रक्रिया चला रहा था।
याचिकाकर्ता का कहना था कि इसी कारण उन्हें एक्सईएन से सुपरिटेंडेंट इंजीनियर के पद पर पदोन्नति नहीं मिल सकी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कोर्ट में याचिका दायर करने के बाद उन्हें अलग-अलग कारणों से तीन चार्जशीट जारी कर दी गईं। याचिकाकर्ता ने इसे प्रताड़ना की कार्रवाई बताया और कहा कि विभाग ने न्यायिक लड़ाई लड़ने के कारण उनके खिलाफ दंडात्मक रवैया अपनाया।
इन्हीं आरोपों को आधार बनाकर सिंगल बेंच ने मामले को गंभीर मानते हुए ACB जांच के आदेश दिए थे। हालांकि अब डिवीजन बेंच ने इस आदेश पर रोक लगाकर मामले को नई दिशा दे दी है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल ACB कोई जांच आगे नहीं बढ़ाएगी, जब तक कि अदालत इस पर अंतिम निर्णय न दे दे।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि डिवीजन बेंच का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि अदालत पहले सभी तथ्यों, विभागीय रिकॉर्ड और कानूनी पक्षों की विस्तार से समीक्षा करना चाहती है। प्रशासनिक निर्णयों, सेवा विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच अंतर करना न्यायिक दृष्टि से आवश्यक माना जाता है।
यह मामला राजस्थान प्रशासनिक सेवा और सरकारी विभागों में पदोन्नति प्रक्रियाओं की पारदर्शिता को लेकर भी बड़ा संकेत देता है। यदि रोस्टर प्रणाली और नियमों के पालन में गड़बड़ी साबित होती है तो विभागीय स्तर पर कई फैसलों की समीक्षा हो सकती है। वहीं यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों को राहत मिलेगी।
आरती डोगरा राजस्थान कैडर की चर्चित आईएएस अधिकारियों में गिनी जाती हैं और कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुकी हैं। ऐसे में उनके खिलाफ जांच आदेश और फिर उस पर तत्काल रोक, दोनों घटनाओं ने इस मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
अब अगली सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि सिंगल बेंच का आदेश कायम रहेगा या उसे निरस्त किया जाएगा। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि विभागीय जांच, प्रमोशन विवाद और चार्जशीट से जुड़े मुद्दों का अंतिम कानूनी समाधान किस दिशा में जाता है।


