राजस्थान हाईकोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक जवान को बड़ी राहत देते हुए करीब 22 साल पहले जारी बर्खास्तगी के आदेश को संशोधित कर अनिवार्य सेवानिवृत्ति (VRS) में बदल दिया है। अदालत ने माना कि जवान से गलती जरूर हुई थी, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए सीधे सेवा से बर्खास्त करना अत्यधिक कठोर सजा थी।
यह फैसला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस.पी. शर्मा और न्यायाधीश संगीता शर्मा की खंडपीठ ने पवन प्रजापति और केंद्र सरकार की ओर से दायर अपीलों की संयुक्त सुनवाई के बाद सुनाया। अदालत ने 27 फरवरी को यह निर्णय देते हुए संबंधित प्राधिकरण को छह सप्ताह के भीतर आवश्यक औपचारिक आदेश जारी करने के निर्देश दिए हैं।
1995 में हुई थी नियुक्ति
रिकॉर्ड के अनुसार पवन प्रजापति को 12 जनवरी 1995 को सीमा सुरक्षा बल में कॉन्स्टेबल (जनरल ड्यूटी) के पद पर नियुक्त किया गया था। वर्ष 2003 में उन्हें 27 अक्टूबर से 4 नवंबर तक आठ दिन की आकस्मिक छुट्टी दी गई थी और उन्हें 5 नवंबर 2003 को वापस ड्यूटी पर रिपोर्ट करना था।
हालांकि निर्धारित तिथि पर वे यूनिट में वापस नहीं लौट सके। बाद में उन्होंने बताया कि उनकी मां की अचानक गंभीर हृदय बीमारी के कारण उन्हें घर पर रुकना पड़ा। इस कारण वे तय समय पर ड्यूटी जॉइन नहीं कर सके और लगभग 77 दिन बाद 20 जनवरी 2004 को स्वयं यूनिट में लौटकर रिपोर्ट किया।
विभाग ने शुरू की थी अनुशासनात्मक कार्रवाई
पवन प्रजापति की अनुपस्थिति को गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए विभाग ने उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी। मामले की सुनवाई संक्षिप्त सुरक्षा बल न्यायालय (SSFC) में हुई और 8 मार्च 2004 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
प्रजापति ने इस फैसले के खिलाफ विभागीय अपील दायर की, लेकिन 31 अगस्त 2004 को अपीलीय प्राधिकारी ने भी उनकी अपील खारिज कर दी और बर्खास्तगी का आदेश बरकरार रखा। इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की और विभागीय कार्यवाही में प्रक्रियागत खामियों का आरोप लगाया।
सिंगल बेंच ने दिया था पुनर्नियुक्ति का आदेश
इस मामले में 19 जुलाई 2023 को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने विभागीय आदेशों को रद्द करते हुए प्रजापति को सेवा में पुनः बहाल करने का निर्देश दिया था। हालांकि अदालत ने बर्खास्तगी से लेकर पुनर्नियुक्ति तक की अवधि के लिए उन्हें बकाया वेतन देने से इनकार कर दिया था और मामले को दोबारा विचार के लिए विभाग को भेज दिया था।
इस आदेश से दोनों पक्ष पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। प्रजापति ने बकाया वेतन नहीं देने और मामले को विभाग को वापस भेजने के फैसले को चुनौती दी, जबकि केंद्र सरकार ने पुनर्नियुक्ति के आदेश के खिलाफ अपील दायर की।
खंडपीठ ने बदला बर्खास्तगी का आदेश
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पाया कि विभागीय जांच में मूल प्रक्रियात्मक नियमों का पालन किया गया था और प्रजापति को आरोपों का जवाब देने तथा गवाहों से जिरह करने का पूरा अवसर दिया गया था। अदालत ने यह भी माना कि वह 77 दिन तक बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित रहे थे और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप साबित होते हैं।
हालांकि कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की कि यह मामला स्थायी रूप से सेवा छोड़ने का नहीं था, क्योंकि प्रजापति स्वयं वापस ड्यूटी पर लौट आए थे और उस समय तक उनका सेवा रिकॉर्ड भी अच्छा रहा था। इसलिए अदालत ने माना कि बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा अपराध के अनुपात में उचित नहीं है।
पेंशन लाभ देने के निर्देश
अदालत ने बर्खास्तगी के आदेश को संशोधित करते हुए उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया। साथ ही निर्देश दिया कि पेंशन के लिए आवश्यक न्यूनतम सेवा अवधि पूरी होने तक प्रजापति की सेवा को काल्पनिक नियमित सेवा माना जाए।


