मनीषा शर्मा। राजस्थान में सरकारी धन के गबन के मामलों में अदालतों का रुख अब लगातार सख्त होता जा रहा है। इसी क्रम में अजमेर स्थित नारेली में वर्ष 2015 में आयोजित एक स्पोर्ट्स टूर्नामेंट के दौरान सरकारी धन के गबन से जुड़े एक बड़े मामले में कोर्ट ने ऐतिहासिक टिप्पणी की है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि “राजधन का गबन चाहे 1 रुपए का हो या 1 करोड़ रुपए का, आरोपी किसी भी स्थिति में कानून से बच नहीं सकते।” इस सख्त रुख के साथ अदालत ने चार पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी के आदेश जारी किए हैं।
फर्जी बिलों के जरिये हुआ सरकारी फंड का दुरुपयोग
यह मामला वर्ष 2015 में हाड़ीरानी महिला बटालियन में आयोजित स्पोर्ट्स टूर्नामेंट से जुड़ा है। टूर्नामेंट के आयोजन के लिए केंद्रीय फंड से लगभग 1.10 लाख रुपए और अजमेर विकास प्राधिकरण (ADA) से करीब 39 हजार रुपए की राशि स्वीकृत हुई थी। जांच में सामने आया कि इस राशि का उपयोग खिलाड़ियों और अधिकारियों के लिए चाय-नाश्ता और भोजन की व्यवस्था के नाम पर किया जाना था, लेकिन वास्तविकता में ऐसा नहीं हुआ।
आरोप है कि पुलिस अधिकारियों ने योजनाबद्ध तरीके से फर्जी बिल तैयार कर सरकारी धन का गबन किया। फर्जी बिलों में कई स्थानीय दुकानों के नाम शामिल किए गए, जो जांच में अस्तित्व में ही नहीं पाई गईं।
जांच में खुला फर्जी दुकानों का जाल
जांच एजेंसियों द्वारा जब मामले की तहकीकात की गई तो यह सामने आया कि “ओम चाट भंडार”, “नज़ीर फ्रूट भंडार”, “रामदेव हलवाई” और “वड़ापाव भंडार” नाम की जिन दुकानों के नाम पर हजारों रुपए के बिल तैयार किए गए थे, वह दुकानें वास्तव में मौजूद ही नहीं थीं।
इतना ही नहीं, टूर्नामेंट समाप्त हो जाने के बाद भी “स्टार भारत दुकान” के नाम पर ₹17,000 का ट्रैक सूट का बिल बनाकर भुगतान कराया गया। यह भुगतान भी पूर्णत: फर्जी तरीके से किया गया। इससे साफ है कि सरकारी फंड को सुनियोजित साजिश के तहत लूटा गया।
आरोपी अधिकारी और गिरफ्तारी के आदेश
अदालत ने जिन अधिकारियों को आरोपी मानते हुए गिरफ्तारी के आदेश जारी किए हैं, उनमें तत्कालीन डिप्टी कमांडेंट यशस्विनी राजौरिया का नाम प्रमुख है। वर्तमान में वह पुलिस भर्ती एवं पदोन्नति बोर्ड, जयपुर में एडिशनल एसपी के पद पर कार्यरत हैं। उनके अलावा डीएसपी घनश्याम वर्मा, हेड कांस्टेबल पूजा तंवर और गोविंद सिंह के खिलाफ भी गिरफ्तारी के आदेश जारी किए गए हैं।
कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी आरोपियों को 11 अक्टूबर तक गिरफ्तार कर पेश किया जाए। अदालत ने माना कि सरकारी धन के गबन के लिए फर्जी बिलों और गलत भुगतानों के सबूत पर्याप्त हैं और इस स्थिति में अब बचने की कोई गुंजाइश नहीं है।
जांच अधिकारियों की लापरवाही पर भी कोर्ट का कड़ा रुख
मामले में केवल आरोपी पुलिस अधिकारियों पर ही नहीं, बल्कि जांच करने वाले अधिकारियों पर भी अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। जांच में पाया गया कि अलवर गेट थाने के तत्कालीन एसआई और अन्य अधिकारियों ने जानबूझकर जांच में देरी की और साक्ष्य समय पर प्रस्तुत नहीं किए। अदालत ने माना कि इस देरी के पीछे आरोपियों को बचाने की कोशिश की गई।
इसी आधार पर अदालत ने अजमेर रेंज पुलिस के आईजी को निर्देश दिया है कि जांच में लापरवाही बरतने वाले सभी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए।
भ्रष्टाचार पर अदालत का सख्त संदेश
इस पूरे मामले में अदालत ने जो सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी की, वह है “राजधन का गबन चाहे 1 रुपए का हो या 1 करोड़ रुपए का, आरोपी नहीं बच सकते।” यह टिप्पणी न केवल इस केस के लिए, बल्कि भविष्य में सरकारी धन से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों के लिए भी मिसाल मानी जा रही है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि अदालत का यह रुख उन सभी मामलों पर असर डालेगा, जिनमें अधिकारी या कर्मचारी सरकारी फंड का दुरुपयोग करते हैं। अदालत ने इस मामले में न केवल आरोपी अधिकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं बल्कि जांच अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की है।


