राजस्थान के अलवर से एक ऐसी प्रेरणादायक पहल सामने आई है, जिसने शिक्षा और पर्यावरण को एक साथ जोड़ते हुए पूरे प्रदेश में नई सोच को जन्म दिया है। डिजिटल युग में जहां युवाओं और बच्चों का झुकाव धीरे-धीरे किताबों से दूर होता जा रहा है, वहीं अलवर जिला प्रशासन ने एक अनूठा प्रयोग करते हुए ‘पार्क लाइब्रेरी’ की शुरुआत की है। इस अभिनव पहल को ‘विद्या कुंज’ नाम दिया गया है, जो न केवल राजस्थान की पहली पार्क लाइब्रेरी है, बल्कि यह राज्य में पुस्तकालय संस्कृति को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस पहल के पीछे डॉ. आर्तिका शुक्ला का दूरदर्शी नेतृत्व है, जो वर्तमान में अलवर की जिला कलक्टर के रूप में कार्यरत हैं। उनके इस विजन का उद्देश्य केवल एक लाइब्रेरी बनाना नहीं, बल्कि एक ऐसा सार्वजनिक स्थान तैयार करना है, जहां लोग प्रकृति के बीच बैठकर पढ़ने का आनंद ले सकें और ज्ञान से जुड़ाव को फिर से मजबूत कर सकें। इस परियोजना को स्थानीय स्तर पर नगर विकास न्यास के सहयोग से साकार किया गया है।
‘विद्या कुंज’ का निर्माण शहर की बुद्ध विहार कॉलोनी के डी-ब्लॉक स्थित एक पार्क में किया गया है। इसकी सबसे खास बात इसका प्राकृतिक और शांत वातावरण है, जहां हरियाली, ताजी हवा और पक्षियों की चहचहाहट के बीच पढ़ाई का अनुभव पारंपरिक बंद कमरों वाली लाइब्रेरी से बिल्कुल अलग है। यहां का माहौल पाठकों को न केवल आकर्षित करता है, बल्कि उनकी एकाग्रता और मानसिक शांति को भी बढ़ाता है।
इस लाइब्रेरी का मुख्य आकर्षण इसका आधुनिक कांच से बना हॉल है, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि पाठक बाहर के प्राकृतिक दृश्य का आनंद लेते हुए अध्ययन कर सकें। यह डिजाइन पारंपरिक लाइब्रेरी से हटकर एक नया अनुभव प्रदान करता है, जो खासतौर पर युवाओं और विद्यार्थियों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। लाइब्रेरी में करीब 5000 पुस्तकों को रखने की क्षमता विकसित की गई है, जिसमें फिलहाल लगभग 1500 किताबें उपलब्ध हैं। इन पुस्तकों में साहित्य, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, सामान्य ज्ञान, धार्मिक ग्रंथ और अन्य महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं, जिससे विभिन्न आयु वर्ग के पाठकों की जरूरतों को पूरा किया जा सके।
इस पहल को जनभागीदारी से जोड़ने के लिए डॉ. आर्तिका शुक्ला ने एक महत्वपूर्ण अपील भी की है। उन्होंने जिले के नागरिकों, समाजसेवी संस्थाओं और भामाशाहों से आग्रह किया है कि वे अपने घरों में रखी उपयोगी और अच्छी स्थिति में मौजूद पुस्तकों को इस लाइब्रेरी के लिए दान करें। उनका मानना है कि किताबें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे संस्कृति और संस्कारों की भी वाहक होती हैं। ऐसे में पुरानी पुस्तकों का दान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य योगदान साबित हो सकता है।
प्रशासन ने इसके लिए विशेष रूप से 15 दिनों का समय निर्धारित किया है, जिसमें कोई भी नागरिक बुद्ध विहार स्थित इस पार्क लाइब्रेरी में जाकर अपनी पुस्तकें दान कर सकता है। यह पहल न केवल लाइब्रेरी के पुस्तक संग्रह को समृद्ध करेगी, बल्कि समाज में साझा जिम्मेदारी और सहयोग की भावना को भी मजबूत बनाएगी।
‘पार्क लाइब्रेरी’ का यह मॉडल शिक्षा और पर्यावरण के अद्भुत संगम का उदाहरण प्रस्तुत करता है। अक्सर यह देखा जाता है कि पारंपरिक लाइब्रेरी के बंद वातावरण में लंबे समय तक पढ़ाई करना कई लोगों के लिए उबाऊ हो जाता है। इसके विपरीत, खुले वातावरण में पढ़ने से न केवल मन प्रसन्न रहता है, बल्कि ध्यान केंद्रित करना भी आसान होता है। यही कारण है कि ‘विद्या कुंज’ जैसी पहलें आधुनिक समय की जरूरतों के अनुरूप मानी जा रही हैं और अन्य शहरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकती हैं।
इस नवाचार की सराहना प्रदेश स्तर पर भी हो रही है। राजस्थान के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने इस पहल को प्रशंसनीय बताते हुए डॉ. आर्तिका शुक्ला और उनकी टीम को बधाई दी है। उन्होंने इसे राजस्थान में पुस्तकालय आंदोलन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि आने वाले समय में इस तरह की और पहलें प्रदेश के अन्य जिलों में भी देखने को मिल सकती हैं।
डॉ. आर्तिका शुक्ला का व्यक्तित्व और कार्यशैली इस पहल के पीछे की प्रेरणा को और अधिक मजबूत बनाती है। वे न केवल एक सक्षम प्रशासक हैं, बल्कि अपने नवाचारों और शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए भी जानी जाती हैं। वर्ष 2015 में उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में पूरे देश में चौथा स्थान हासिल किया था, वह भी बिना किसी कोचिंग के पहले प्रयास में। प्रशासनिक सेवा में आने से पहले वे एक डॉक्टर भी रह चुकी हैं और उन्होंने मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की है। उनका यह बहुआयामी अनुभव प्रशासनिक कार्यों में नई सोच और दृष्टिकोण लाने में सहायक रहा है।


