राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव को लेकर अनिश्चितता का माहौल लगातार गहराता जा रहा है। चुनाव की तारीख घोषित नहीं होने से जहां राजनीतिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं, वहीं अब यह मामला एक बार फिर न्यायपालिका के दरवाजे तक पहुंच गया है। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर दी है। इस याचिका के जरिए उन्होंने आरोप लगाया है कि अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद सरकार चुनाव कराने में देरी कर रही है।
सरकार पर चुनाव टालने के आरोप
संयम लोढ़ा ने कहा कि प्रदेश में कई पंचायत और निकायों में वर्ष 2024 से ही सीटें खाली पड़ी हैं, लेकिन सरकार ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ जैसी अवधारणा का हवाला देकर चुनाव टालती रही। अब सरकार ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को कारण बता रही है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 2022 के एक फैसले के अनुसार स्थानीय निकायों में सीटों को लंबे समय तक रिक्त नहीं रखा जा सकता। इसके बावजूद चुनाव प्रक्रिया में देरी करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है।
मंत्री जोगाराम पटेल का जवाब
इस पूरे विवाद पर राज्य सरकार की ओर से कैबिनेट मंत्री जोगाराम पटेल ने विपक्ष पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि सरकार चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन चुनाव करवाना राज्य निर्वाचन आयोग का काम है। पटेल के अनुसार सरकार का दायित्व चुनाव से पूर्व की तैयारियां सुनिश्चित करना है, जो पूरी कर ली गई हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार किसी भी प्रकार से चुनाव टालने के पक्ष में नहीं है।
ओबीसी आरक्षण बना मुख्य मुद्दा
चुनाव में देरी के पीछे ओबीसी आरक्षण का मुद्दा भी प्रमुख कारण बनकर उभरा है। मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के मामलों में स्पष्ट किया था कि ओबीसी आरक्षण लागू करने से पहले विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना जरूरी है। उन्होंने कांग्रेस से सवाल करते हुए कहा कि जब समय पर ओबीसी आयोग का गठन किया जाना चाहिए था, तब ऐसा क्यों नहीं किया गया। अब रिपोर्ट के बिना चुनाव कराना संभव नहीं है, क्योंकि इससे कानूनी विवाद और बढ़ सकते हैं।
‘नियम अनुसार चुनाव कराएगा आयोग’
सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि जैसे ही ओबीसी आयोग की रिपोर्ट प्राप्त होगी, राज्य निर्वाचन आयोग नियमों के अनुसार चुनाव कराएगा। मंत्री पटेल ने यह भी कहा कि यदि विपक्ष सार्वजनिक रूप से यह कह दे कि बिना ओबीसी आरक्षण के चुनाव कराए जाएं, तो इस पर विचार किया जा सकता है। फिलहाल सरकार रिपोर्ट का इंतजार कर रही है और उसी के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
इस पूरे मामले में न्यायपालिका के निर्देश बेहद महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को 439 याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। इसके साथ ही अदालत ने 31 दिसंबर 2025 तक परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने का भी आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी 15 अप्रैल तक चुनाव कराने के निर्देश को बरकरार रखा। इसके बावजूद अब तक चुनाव की तारीख घोषित नहीं होने से कानूनी स्थिति और जटिल हो गई है।
राजनीतिक माहौल में बढ़ी हलचल
चुनाव को लेकर जारी अनिश्चितता का असर प्रदेश के राजनीतिक माहौल पर भी स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है। संभावित उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी थीं, लेकिन तारीख घोषित नहीं होने से उनकी रणनीतियां अधर में लटक गई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी चुनाव को लेकर उत्साह और असमंजस दोनों की स्थिति बनी हुई है। कई स्थानों पर लोग चुनाव टलने के पीछे के कारणों को लेकर चर्चा कर रहे हैं।
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजरें हाईकोर्ट की सुनवाई और सरकार की अगली रणनीति पर टिकी हुई हैं। यदि अदालत सरकार और निर्वाचन आयोग के रुख से संतुष्ट नहीं होती है, तो सख्त निर्देश जारी किए जा सकते हैं। वहीं, ओबीसी आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ने की संभावना है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार निर्धारित समय सीमा के भीतर चुनाव कराने में सफल होती है या नहीं। कुल मिलाकर राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव को लेकर बना यह गतिरोध आने वाले दिनों में राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बड़ा मुद्दा बन सकता है।


