राजस्थान विधानसभा में मंगलवार को एक महत्वपूर्ण विधायी फैसला लिया गया, जिसके तहत नगर निकाय चुनावों में लागू दो बच्चों की बाध्यता को समाप्त कर दिया गया है। विधानसभा ने राजस्थान नगरपालिका संशोधन विधेयक को पारित कर दिया, जिससे अब दो से अधिक बच्चे होने पर भी कोई व्यक्ति पार्षद, मेयर, नगरपालिका अध्यक्ष या सभापति बनने के लिए चुनाव लड़ सकेगा। विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने सरकार को कई मुद्दों पर घेरने का प्रयास किया। विपक्षी दलों के नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार दो बच्चों की शर्त तो हटा रही है, लेकिन नगर निकायों के चुनाव कराने को लेकर गंभीर नहीं है। इस मुद्दे को लेकर सदन में कुछ समय के लिए हंगामे जैसी स्थिति भी बन गई।
राजस्थान नगरपालिका संशोधन विधेयक – चुनाव कराने को लेकर विपक्ष का हमला
विधानसभा में इस विधेयक पर चर्चा की शुरुआत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गोविंद सिंह डोटासरा ने की। उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि एक ओर सरकार चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों की बाध्यता खत्म कर रही है, लेकिन दूसरी ओर नगरीय निकायों के चुनाव नहीं करवाए जा रहे हैं। डोटासरा ने यह सवाल भी उठाया कि यदि चुनाव के लिए यह शर्त हटाई जा रही है तो क्या सरकारी नौकरियों और केंद्र व राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं में भी दो बच्चों की शर्त समाप्त की जाएगी। उन्होंने इस मुद्दे पर सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा।
कांग्रेस के विधायक नरेंद्र बुड़ानियां और बहुजन समाज पार्टी के विधायक मनोज कुमार ने भी इस विषय को उठाते हुए सरकार से सवाल किए। विपक्षी सदस्यों ने कहा कि सरकार को केवल नियमों में बदलाव करने के बजाय चुनाव प्रक्रिया को भी जल्द पूरा करना चाहिए।
ओबीसी आरक्षण पर सरकार का पक्ष
नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि नगर निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि जब तक राज्य ओबीसी आयोग की ओर से अधिकृत आंकड़े प्रस्तुत नहीं किए जाते, तब तक आरक्षण लागू करना संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही आगे बढ़ रही है। यदि बिना ओबीसी आरक्षण के चुनाव कराने का प्रस्ताव विपक्ष देना चाहता है, तो सरकार उस पर भी विचार करने के लिए तैयार है।
खर्रा ने सदन में कहा कि यदि विपक्ष बिना आरक्षण के चुनाव कराने के पक्ष में प्रस्ताव देता है तो सरकार अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट में अनुमति के लिए प्रार्थना पत्र दाखिल कर सकती है।
सरकार पर आयोगों को कमजोर करने का आरोप
विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार पर कई गंभीर आरोप भी लगाए। कांग्रेस के गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि सरकार पंचायतों और नगरीय निकायों के चुनावों के लिए आवश्यक डेटा ओबीसी आयोग को उपलब्ध नहीं करा रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ओबीसी आयोग को आवश्यक संसाधन भी उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। डोटासरा ने कहा कि आयोग को वाहन, पेन, स्टेशनरी जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दी गईं, जिससे उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हुई है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्य निर्वाचन आयोग को भी स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने दिया जा रहा और उसे कठपुतली की तरह काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल तक चुनाव कराने का फैसला दिया है, लेकिन सरकार ओबीसी आयोग की रिपोर्ट का बहाना बनाकर चुनाव टाल रही है।
अन्य प्रशासनिक मुद्दों पर भी स्पष्टीकरण
नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने चर्चा के दौरान कुछ अन्य प्रशासनिक मुद्दों पर भी स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि बिजली के बिल के साथ यूडी टैक्स वसूलने के संबंध में सरकार ने कोई आदेश जारी नहीं किया है।
इसके अलावा उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी संस्था के नाम पर राजस्व रिकॉर्ड में भूमि दर्ज है, तभी उस भूमि पर विधायक कोष की राशि खर्च की जा सकती है। इसका उद्देश्य सरकारी धन के उपयोग में पारदर्शिता और नियमों का पालन सुनिश्चित करना है।
राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व
नगरपालिका संशोधन विधेयक के पारित होने के साथ ही राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण नियम बदल गया है। दो बच्चों की बाध्यता हटने से अब अधिक लोग चुनावी प्रक्रिया में भाग ले सकेंगे। हालांकि विपक्ष का कहना है कि केवल नियमों में बदलाव पर्याप्त नहीं है और सरकार को जल्द से जल्द नगरीय निकायों के चुनाव कराने की दिशा में भी ठोस कदम उठाने चाहिए। आने वाले समय में यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बना रह सकता है।


