मनीषा शर्मा। राजस्थान की राजनीति में 2020 का बहुचर्चित संकट एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह है राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जिसमें उस समय दर्ज किए गए विधायकों की खरीद-फरोख्त से जुड़े केस को बंद कर दिया गया है। अदालत ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि जांच में किसी भी प्रकार के सबूत नहीं मिले, जो साबित कर सकें कि सचिन पायलट खेमे के विधायकों को खरीदने की कोशिश हुई थी।
सुरेश रावत का हमला: “सांच को आंच नहीं”
इस फैसले के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। भजनलाल सरकार में मंत्री सुरेश रावत ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, “सांच को आंच नहीं। उस समय भी यह उनकी आपसी लड़ाई थी। कांग्रेस की आपसी खींचतान में पूरी सरकार होटल में बैठी रही और जनता का शोषण होता रहा। अब कोर्ट ने भी मान लिया कि यह सब कांग्रेस का ड्रामा था।” रावत ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस की इस लड़ाई ने राज्य को कई साल पीछे धकेल दिया। उनके अनुसार, कांग्रेस की पुरानी आदत है कि अपनी गलती छिपाने के लिए दूसरों पर उंगली उठाती है।
सचिन पायलट का बयान: न्यायपालिका पर भरोसा
वहीं, इस मामले पर पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने संयमित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “मैंने रिपोर्ट नहीं देखी है। लेकिन जब कोर्ट ने निर्णय दे दिया है तो अब कुछ कहने को बचा नहीं है। मुझे लगता है कि देश की न्यायपालिका पर सबको भरोसा है और यह संस्था मजबूत है।” जब पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या यह पूरा मामला ‘फर्जी’ था, तो पायलट मुस्कुराए और बोले, “जब आप कह रहे हैं और कोर्ट का फैसला भी आ चुका है, तो मुझसे क्या कहलवाना चाहते हो।” उनके इस जवाब को इस बात की पुष्टि माना जा रहा है कि पायलट ने इस केस को शुरू से ही राजनीतिक साजिश माना था।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद जुलाई 2020 का है, जब राजस्थान की राजनीति में भूचाल आ गया था। तत्कालीन डिप्टी सीएम सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत कर दी थी। इस दौरान गहलोत गुट ने आरोप लगाया कि पायलट खेमे को भाजपा के साथ मिलकर सरकार गिराने की साजिश रची जा रही है। इन आरोपों के आधार पर एसओजी (SOG) और एसीबी (ACB) में मुकदमे दर्ज कराए गए। एसीबी ने केस दर्ज किया था कि निर्दलीय विधायक रमीला खड़िया और अन्य को खरीदने की कोशिश की गई। इस मामले में अशोक सिंह और भरत मलानी पर आरोप लगाया गया कि वे सरकार को अस्थिर करने और राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के लिए विधायकों को प्रभावित कर रहे थे।
फोन रिकॉर्डिंग बनी थी सबूत
गहलोत सरकार की ओर से पेश किए गए सबूतों में कुछ फोन कॉल रिकॉर्डिंग शामिल थीं। कहा गया कि इन रिकॉर्डिंग में विधायकों की खरीद-फरोख्त की बातचीत दर्ज है। लेकिन एसीबी ने अपनी जांच में पाया कि इन बातचीतों में सिर्फ गहलोत और पायलट गुट के बीच की राजनीतिक स्थिति, आईपीएल और सामान्य विषयों पर चर्चा थी।
क्यों हुआ केस बंद?
एसीबी की क्लोजर रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि न तो कॉल रिकॉर्डिंग और न ही किसी बैंक ट्रांजैक्शन में पैसे के लेन-देन या विधायकों को खरीदने का कोई सबूत मिला। इस आधार पर हाईकोर्ट ने केस को बंद करने का आदेश दिया। यह फैसला न केवल आरोपियों के लिए राहत है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि 2020 का राजनीतिक संकट कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का नतीजा था, जिसमें खरीद-फरोख्त के आरोप टिक नहीं पाए।
राजनीतिक महत्व
हाईकोर्ट के इस निर्णय ने राजस्थान की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। भाजपा नेता इसे कांग्रेस की अंदरूनी कलह बता रहे हैं, वहीं कांग्रेस के भीतर अब भी इस मुद्दे को लेकर चुप्पी है। सचिन पायलट ने जहां न्यायपालिका पर भरोसा जताकर मामले को शांत करने की कोशिश की, वहीं सुरेश रावत जैसे नेताओं ने इसे कांग्रेस की कमजोरी और जनता के साथ धोखा बताया।


