मनीषा शर्मा। राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव को लेकर चल रहे विवाद का मामला गुरुवार को राजस्थान हाईकोर्ट में एक बार फिर गरमा गया। राज्य सरकार की ओर से अदालत में दायर जवाब में छात्रसंघ चुनाव कराने से साफ इंकार किया गया, जिसके बाद कोर्ट ने सरकार से सीधा सवाल पूछा कि जब सांसद और विधायक के चुनाव हो सकते हैं, तो छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं कराए जा सकते? अदालत की यह टिप्पणी न केवल कानूनी पहलुओं पर सवाल खड़े करती है, बल्कि राज्य की राजनीतिक बहस को भी और अधिक गर्माने का काम कर रही है।
राजस्थान हाईकोर्ट में यह सुनवाई याचिकाकर्ता जय राव की ओर से दाखिल याचिका पर हुई। मामले की सुनवाई जस्टिस समीर जैन की एकल पीठ में हो रही है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव को फिर से बहाल किया जाए, क्योंकि यह छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा मुद्दा है। याचिका में तर्क दिया गया है कि छात्र राजनीति न केवल नेतृत्व क्षमता विकसित करती है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की समझ भी छात्रों में पैदा करती है।
बुधवार को राज्य सरकार ने कोर्ट में अपना लिखित जवाब पेश किया था। इस जवाब में सरकार ने साफ कहा कि छात्रसंघ चुनाव मौलिक अधिकार के अंतर्गत नहीं आते, इसलिए सरकार इन्हें कराने के लिए बाध्य नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए चुनाव न कराने का निर्णय लिया गया है। सरकार के इस रुख पर कोर्ट ने सवाल खड़ा करते हुए कहा कि जब देश में सांसद (MP) और विधायक (MLA) के चुनाव शांतिपूर्वक हो सकते हैं, तो छात्रसंघ चुनाव को लेकर इतना डर और हिचकिचाहट क्यों? अदालत ने सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा कि इस फैसले के पीछे क्या ठोस कारण हैं।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि लोकतंत्र में चुनाव एक बुनियादी प्रक्रिया है, और अगर इसे शिक्षा संस्थानों से हटा दिया जाए, तो इसका असर छात्रों की राजनीतिक समझ और भागीदारी पर पड़ेगा। इस मामले में अंतिम सुनवाई 22 अगस्त को निर्धारित की गई है, जहां से उम्मीद की जा रही है कि इस लंबे समय से चल रहे विवाद पर कुछ ठोस दिशा मिल सकती है।
इस मुद्दे पर राजनीति भी तेज हो गई है। प्रदेश के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि छात्रों पर लाठीचार्ज नहीं होना चाहिए, लेकिन अगर कोई कानून हाथ में लेता है तो उस पर कार्रवाई करनी पड़ती है। मीणा ने आरोप लगाया कि जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे, तब सीकर जाते समय उनके ऊपर भी लाठीचार्ज करवाया गया था। उन्होंने कहा कि सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रख दिया है, लेकिन उनका मानना है कि मौजूदा सरकार को अशोक गहलोत वाली गलती नहीं दोहरानी चाहिए। मीणा ने तंज भरे लहजे में कहा कि उन्हें तो वही कहना पड़ेगा जो सरकार कहेगी — “जाएं तो कहां जाएं?”
राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव का मुद्दा पिछले कई वर्षों से विवादों में रहा है। कभी हिंसक झड़पों, तो कभी प्रशासनिक कारणों से चुनाव स्थगित होते रहे हैं। इस बार भी सरकार का कहना है कि चुनाव कराने से कानून-व्यवस्था पर असर पड़ सकता है, जबकि छात्र संगठन इसे अपनी लोकतांत्रिक भागीदारी के अधिकार से जोड़कर देख रहे हैं। ABVP और NSUI सहित कई छात्र संगठन लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। हाल ही में राजस्थान यूनिवर्सिटी में छात्रों द्वारा भूख हड़ताल, रैलियां और प्रदर्शन कर सरकार पर दबाव बनाया गया है, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक निर्णय सामने नहीं आया।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पहले ही इस मुद्दे पर छात्रों का समर्थन कर चुके हैं। उन्होंने सरकार पर बल प्रयोग का आरोप लगाते हुए कहा था कि लोकतंत्र में धरना, प्रदर्शन और अनशन अपने विचार रखने का अधिकार है, और सरकार को बातचीत से समाधान निकालना चाहिए। वहीं, मौजूदा सरकार का कहना है कि वह अदालत के निर्देशों के अनुसार आगे की कार्रवाई करेगी।


