राजस्थान में आगामी नगर निगम, नगर पालिका और पंचायत चुनावों को लेकर पिछले कुछ समय से भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। चर्चा यह थी कि राज्य सरकार पात्रता नियमों में बड़े संशोधन करने जा रही है, जिसमें दो से अधिक संतान वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने की अनुमति और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता लागू करने जैसे बदलाव शामिल हैं। इन अफवाहों के चलते संभावित उम्मीदवारों में संशय और अटकलों का दौर जारी था। हालांकि अब राज्य सरकार ने आधिकारिक रूप से स्पष्ट किया है कि निकट भविष्य में पात्रता नियमों में किसी बड़े बदलाव की कोई योजना नहीं है, जिससे उम्मीदवारों में फैली शंकाओं का समाधान हो गया है।
शैक्षणिक योग्यता पर सरकार का स्पष्ट रुख
स्वायत्त शासन विभाग (DLB) ने रतनगढ़ विधायक पूसाराम गोदारा के प्रश्न के लिखित उत्तर में स्पष्ट किया कि राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 की धारा 21 के तहत पार्षदों या नगरपालिका चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए किसी भी प्रकार की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है। इसका अर्थ यह है कि आगामी निकाय चुनावों में भी अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे उम्मीदवार पहले की तरह चुनाव लड़ सकेंगे। राज्य सरकार के इस जवाब से यह साफ हो गया है कि फिलहाल शिक्षा को पात्रता का आधार बनाने की कोई मंशा नहीं है।
दो संतान नीति: संशोधन प्रक्रिया में, पर लागू नहीं
राजस्थान में लंबे समय से यह चर्चा चल रही है कि 27 नवंबर 1995 के बाद तीसरी संतान होने पर लागू चुनाव लड़ने की रोक को हटाया जा सकता है। इस नीति में बदलाव को लेकर उच्च स्तर पर विचार-विमर्श भी हुआ है। लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि दो संतान नीति हटाने का मामला अभी “प्रक्रिया में” है, इस पर किसी प्रकार का अंतिम निर्णय कैबिनेट की ओर से पास नहीं हुआ है। इसलिए आगामी निकाय और पंचायत चुनाव पुराने नियमों के आधार पर ही होंगे।
राजनीतिक गलियारों में शुरू हुआ नया विवाद
सरकार के इस स्पष्टीकरण के बाद प्रदेश की राजनीति में बहस छिड़ गई है। पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं।
विरोध में तीखे स्वर
पूर्व पार्षद दशरथ सिंह शेखावत का कहना है कि:
21वीं सदी में जनप्रतिनिधियों के लिए सीमित संतान नीति एक जरूरी आवश्यकता है।
कम संतान वाले नेता समाज के लिए प्रेरक उदाहरण पेश करते हैं।
निकायों के संचालन के लिए शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य होना जरूरी है।
उनका मानना है कि सरकार को पिछली दिशा में कदम नहीं बढ़ाना चाहिए।
समर्थन में तर्क
पूर्व मेयर ज्योति खंडेलवाल ने सरकार के इस निर्णय को सकारात्मक बताया। उनके अनुसार शैक्षणिक योग्यता की शर्त हटाने से अधिक लोगों को लोकतंत्र में भाग लेने का अवसर मिलेगा। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में जहां पारिवारिक संरचना बड़ी होती है, वहां नियमों की कठोरता से कई योग्य व्यक्ति चुनाव प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं। उनके मुताबिक, यह निर्णय लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करेगा।
भविष्य में संशोधन की संभावना
हालांकि सरकार ने मौजूदा चुनावों के लिए किसी भी नियम में बदलाव की संभावना से इनकार किया है, लेकिन भविष्य में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया गया है। स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा के पूर्व के बयान बताते हैं कि: राजस्थान नगरपालिका अधिनियम की धारा 24 में संशोधन का प्रस्ताव विधि विभाग के पास भेजा गया है। यदि इसे विधि विभाग द्वारा मंजूरी मिलती है, तो संशोधन को कैबिनेट के सामने रखा जाएगा। कैबिनेट स्वीकृति के बाद यह प्रस्ताव विधानसभा में विधेयक के रूप में लाया जा सकता है। परंतु वर्तमान स्थिति यह है कि आगामी चुनाव पुराने पात्रता नियमों के अनुसार ही संपन्न होंगे।
उम्मीदवारों को क्या संदेश मिला?
राजस्थान में निकाय चुनावों की तैयारियों में जुटे उम्मीदवारों के लिए यह खबर बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार के वर्तमान रुख से दो बाते स्पष्ट हैं: दो से अधिक संतान वाले उम्मीदवारों को अभी भी चुनाव लड़ने से रोक रहे नियम लागू रहेंगे। शैक्षणिक योग्यता लागू नहीं होगी, इसलिए कम पढ़े-लिखे उम्मीदवारों को बाधा नहीं आएगी। इससे वे उम्मीदवार जो संभावित संशोधन के आधार पर अपनी रणनीति बदल रहे थे, अब वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर चुनावी तैयारी कर सकते हैं।
प्रशासन की आधिकारिक टिप्पणी
स्वायत्त शासन विभाग के सचिव रवि जैन ने कहा कि: “पिछले कुछ समय से दो बच्चों की नीति को हटाने पर चर्चा चल रही है। फिलहाल यह अपेक्षित है और प्रक्रियाधीन है।” यह बयान बताता है कि निर्णय अभी लंबित है और जल्दबाज़ी में कोई घोषणा नहीं की जाएगी।


