टोंक–सवाई माधोपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद हरीश चन्द्र मीणा ने प्रस्तावित डूंगरी बांध परियोजना को लेकर केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। उन्होंने लोकसभा की कार्य-संचालन नियमावली के नियम 197 के तहत ध्यानाकर्षण प्रस्ताव प्रस्तुत कर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री का ध्यान इस महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर आकृष्ट किया। सांसद मीणा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि डूंगरी बांध परियोजना अब केवल एक तकनीकी या प्रशासनिक योजना नहीं रह गई है, बल्कि यह पूर्वी राजस्थान की जनता के भविष्य, अस्तित्व और सरकार पर भरोसे से सीधे तौर पर जुड़ चुकी है।
जनता में अनिश्चितता और भय का माहौल
सांसद मीणा ने लोकसभा में कहा कि टोंक–सवाई माधोपुर सहित आसपास के जिलों में रहने वाले हजारों परिवार पिछले कई महीनों से असमंजस और भय की स्थिति में जी रहे हैं। डूंगरी बांध परियोजना को लेकर न तो डूब क्षेत्र की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध है और न ही यह बताया गया है कि कितने गांव, घर और कितनी उपजाऊ कृषि भूमि इससे प्रभावित होगी। इस अनिश्चितता ने ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता और आशंका का माहौल पैदा कर दिया है, जिससे लोगों का दैनिक जीवन और भविष्य की योजनाएं प्रभावित हो रही हैं।
डूब क्षेत्र को लेकर बुनियादी सवाल
सांसद ने सदन में यह सवाल उठाया कि आखिर इस परियोजना से वास्तविक लाभ किसे मिलेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा। उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में पीढ़ियों से लोग खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं, वहां यह स्पष्ट न होना कि उनकी जमीन और घर सुरक्षित रहेंगे या नहीं, अपने आप में सरकार की गंभीर विफलता को दर्शाता है। मीणा ने बताया कि स्थानीय जनता लगातार यह जानना चाहती है कि डूंगरी बांध से कितनी कृषि भूमि डूब क्षेत्र में आएगी और पुनर्वास की क्या ठोस योजना है।
जानकारी सार्वजनिक न होना बना बड़ा मुद्दा
हरीश चन्द्र मीणा ने यह भी रेखांकित किया कि सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस, पारदर्शी और भरोसेमंद जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। उन्होंने सदन को अवगत कराया कि स्वयं केंद्रीय जल शक्ति मंत्री ने लोकसभा में पूर्व में दिए गए एक उत्तर में स्वीकार किया था कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि कौन से गांव डूबेंगे और कितना क्षेत्र प्रभावित होगा। इसके बावजूद परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है, जो जनता के मन में अविश्वास को और गहरा कर रहा है।
विकास बनाम विस्थापन की बहस
सांसद मीणा ने अपने वक्तव्य में जोर देकर कहा कि विकास का अर्थ कभी भी विस्थापन नहीं हो सकता। यदि कोई परियोजना हजारों परिवारों की जमीन, पहचान और जीवन-यापन के साधनों को खतरे में डालती है, तो उसे जनहितकारी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि जब लोग अपनी पीढ़ियों की मेहनत खोने की आशंका से जूझ रहे हों, तब सरकार का दायित्व केवल फाइलों और रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हर निर्णय को ईमानदारी से जनता के सामने रखना चाहिए।
पारदर्शिता और जन-सहमति की मांग
लोकसभा अध्यक्ष के माध्यम से सांसद मीणा ने मांग की कि डूंगरी बांध परियोजना से जुड़े सभी निर्णय, सर्वेक्षण, डूब क्षेत्र का आकलन और पर्यावरण एवं सामाजिक प्रभाव अध्ययन सार्वजनिक किए जाएं। उन्होंने कहा कि इससे प्रभावित होने की आशंका झेल रही जनता को स्पष्ट और भरोसेमंद जवाब मिल सकेगा। पारदर्शिता और संवाद के बिना किसी भी बड़ी परियोजना को लागू करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
सरकार और जनता के बीच विश्वास की कसौटी
अपने वक्तव्य के अंत में हरीश चन्द्र मीणा ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सच्ची कसौटी जनता का विश्वास जीतने में निहित होती है। यदि सरकार समय रहते सभी तथ्यों को सामने रखती है और प्रभावित लोगों की आशंकाओं का समाधान करती है, तभी डूंगरी बांध जैसी परियोजनाएं वास्तव में विकास का माध्यम बन सकती हैं। अन्यथा, यह परियोजना पूर्वी राजस्थान में लंबे समय तक असंतोष और अविश्वास का कारण बनी रहेगी।


